कृप्या उपयुक्त शीर्षक सुझाएँ
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मिलने पर
"कैसे हो" पूछने वाले
लोग बहुत हैं
पर चुरायी नज़रों से कहे
"अच्छी हूँ" में
सच का अंश तोलने वाला
कोई नहीं!
सिर्फ एक maggi खा
दिन गुजार देती हूँ
यह देख
गुस्सा करने वाले
लोग बहुत हैं
पर टिफिन में
एक रोटी एक्स्ट्रा लाने वाला
कोई नहीं!
हर कदम पर
कुल, मर्यादा, रिश्ते, समाज, धर्म, संस्कृति,
की दुहाई दे दिशा निर्देश देने वाले
लोग बहुत हैं
पर प्यार से "मेरी खातिर" कह
मुझे रोकने वाला
कोई नहीं
प्रश्न साध
मेरी खामोशी का कांच
तोड़ देने वाले
लोग बहुत हैं
पर मेरी खामोशी बाँट
प्रश्न की ज़रुरत ही
नष्ट कर देने वाला
कोई नहीं
जीवन में मेरी घटती आस्था देख
लक्ष्य, स्वप्न, मंजिल, सार्थकता, अस्तित्व,आदि पर
घंटों ज्ञान देने वाले
लोग बहुत हैं
पर विश्वास भरी एक निगाह से
जीने की वजह दे जाने वाला
कोई नहीं
सच,
मेरे पास .........लोग बहुत हैं!
पर,
मेरा ..........कोई नहीं !!
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अआह ....... वाह !!
ReplyDeleteबहुत ह्रदयस्पर्शी कविता लिखी है आपने !
एक ऐसी रचना जो सीधे तौर पर पाठक से संवाद करती है !
कोई नया नाम सोचने तक
फिलहाल शीर्षक "अनुभूति" रख कर देखिये !
आज बहुत दिन बाद अपनी डायरी में कोई कविता
नोट करके पंक्तियों को अपने साथ ले जा रहा हूँ !
आज की आवाज
अपनों के बीच एकांत
ReplyDeleteवाह!नायाब!अकेलेपन को अकेला मह्सूस करा देने वाली अभिव्यक्ति है ये!
ReplyDeleteअगर कुछ कह पाऊं तो बस ये के:
"कौन रहनुमा है यहां,और कौन यहां रहबर है,
हर इंसान को इस राह पे अकेले ही चलना होगा."
Happy Blogging!
दर असल "मैं कौन"? में पूरी कहानी है, क्यो कि,क्या ऐसा भी कोई जिसका कोई नही!
ReplyDeleteजवाब नहीं आपका इस बेहतरीन और लाजवाब रचना के लिए बधाई !
ReplyDeleteउत्तर आधुनिक मानव के जीवन की व्यथा को बहुत ही संवेदनशील शब्दों में अभिव्यक्त किया गया है.....यही आधुनिक मनुष्य का दुखांत है....इसे शब्दों में पकड़ने के लिए मुबारक ..............अमरजीत कौंके
ReplyDelete098142 31698
सच का अंश तोलने वाला
ReplyDeleteकोई नहीं!
वाकई सच का अंश तोलने वाला कोई नही है
विसंगतियो को बखूबी चित्रित किया है.
mera koi nahi....ya ...khamoshi kaa kanch
ReplyDeleteप्रश्न साध
ReplyDeleteमेरी खामोशी का कांच
तोड़ देने वाले
लोग बहुत हैं
पर मेरी खामोशी बाँट
प्रश्न की ज़रुरत ही
नष्ट कर देने वाला
कोई नहीं....
saare lines bahut pyari aur dil se likhi hui.. maine bhi apni ek nayee nazm ka naam 'ek tanha nazm' diya tha..aapki kavita ko jyada suit kerta hai :)
kavitayein to maine bhi kaafi likhi....par ye padh ke lagta hai..abhi bahut sikhna baaki hai...kamaal ki abhivyakti paayi hai aapne...
ReplyDeleteyun to har pankti aur ant ka sawal jaise dil me utar jaata hai par ye wali lines bahut gahre asar karti hain.
ReplyDeleteहर कदम पर
कुल, मर्यादा, रिश्ते, समाज, धर्म, संस्कृति,
की दुहाई दे दिशा निर्देश देने वाले
लोग बहुत हैं
पर प्यार से "मेरी खातिर" कह
मुझे रोकने वाला
कोई नहीं
is pyaar se kahe meri khatir ke liye kya na chhod diya jaaye...bas koi kah ke to dekhe.
main aur samaj me kitna bada antar aa jata hai.
Wonderful piece of work...touched my heart!!!
ReplyDeleteसिर्फ एक maggi खा
ReplyDeleteदिन गुजार देती हूँ
यह देख
गुस्सा करने वाले
लोग बहुत हैं
पर टिफिन में
एक रोटी एक्स्ट्रा लाने वाला
कोई नहीं!
:) :) ...hehehhe..bichari bachhi...
आपके लेखन का तो कोई ज़वाब ही नहीं है, मैं ये कविता लिखता तो शीर्षक होता "भीड़ में तन्हा"
ReplyDeleteब्लॉग की दुनिया में नया हूँ, मैं सोच भी नहीं सकता था की यहाँ एक अलग इतनी बड़ी दुनिया है!
ReplyDeleteaapne khud hi to likha har jagah............."koi nahi"
ReplyDeletebahut baareek bahut sundar rachnaa
badhayee