Wednesday, August 19, 2009

'निर्माण'

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सागर, सहरां, सूरज, परबत,
और तो और वक़्त भी.........

सृष्टि को जब भी देखा मैंने,
पाया यही,
कि 'निर्माण'
'जुड़ने' और 'जोड़-सकने'
के एक मात्र सिद्धांत पर,
आधारित है...


पर फिर
जाने कैसे इस दुनिया के लोगों ने,
दुनिया को टुकडों टुकडों में
काट-बाँट कर,
अपनी-अपनी अलग
दुनियाएँ बना लीं ????

7 comments:

  1. उम्दा चिंतन.
    लय और प्रलय का चक्र या ध्वंस और रचना का परस्पर सम्बन्ध इसे समझने में शायद काम आये.

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  2. आप को पढ़ कर कोई शांत मन लिए रह जाए ये सम्भव नही, जब भी आप को मौका मिलता है, झिंझोड़ डालते हैं सब को अन्दर बाहर............

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  3. जाने कैसे इस दुनिया के लोगों ने,
    दुनिया को टुकडों टुकडों में
    काट-बाँट कर,
    अपनी-अपनी अलग
    दुनियाएँ बना लीं ????
    बहुत सुन्दर रचना. मोहक चिंतन. ज़ायज प्रश्न
    बहुत सुन्दर

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  4. bahut hi sunder kavita



    htttp://sanjaybhaskar.blogspot.com

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  5. Bahut khoob!! ek dum sahi baat kahi hai aapne....nazm bahut achhi hai..!! :)

    --Gaurav

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