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सागर, सहरां, सूरज, परबत,
और तो और वक़्त भी.........
सृष्टि को जब भी देखा मैंने,
पाया यही,
कि 'निर्माण'
'जुड़ने' और 'जोड़-सकने'
के एक मात्र सिद्धांत पर,
आधारित है...
पर फिर
जाने कैसे इस दुनिया के लोगों ने,
दुनिया को टुकडों टुकडों में
काट-बाँट कर,
अपनी-अपनी अलग
दुनियाएँ बना लीं ????
उम्दा चिंतन.
ReplyDeleteलय और प्रलय का चक्र या ध्वंस और रचना का परस्पर सम्बन्ध इसे समझने में शायद काम आये.
सुंदर रचना... वाह..
ReplyDeleteआप को पढ़ कर कोई शांत मन लिए रह जाए ये सम्भव नही, जब भी आप को मौका मिलता है, झिंझोड़ डालते हैं सब को अन्दर बाहर............
ReplyDeleteजाने कैसे इस दुनिया के लोगों ने,
ReplyDeleteदुनिया को टुकडों टुकडों में
काट-बाँट कर,
अपनी-अपनी अलग
दुनियाएँ बना लीं ????
बहुत सुन्दर रचना. मोहक चिंतन. ज़ायज प्रश्न
बहुत सुन्दर
badiya kavita vartika..
ReplyDeletebahut hi sunder kavita
ReplyDeletehtttp://sanjaybhaskar.blogspot.com
Bahut khoob!! ek dum sahi baat kahi hai aapne....nazm bahut achhi hai..!! :)
ReplyDelete--Gaurav