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सामने विस्तार ही विस्तार है
दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
पता नहीं!
पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है |
पहाड़ जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बताना मुश्किल है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है |
पर आसमान है |
और दूर तक है
इतनी दूर तक कि उसका दूसरा सिरा कहाँ है
मुझे नहीं दीखता...
शायद अनंत में होगा ...मुझे क्या ?
बारवीं मंजिल पर बैठ
शीशे कि दीवारों से
हर रोज़ देखती हूँ ये विस्तार
और हर रोज़ ही महसूसती हूँ
अपने भीतर कुछ घुटता हुआ ...
"महा"-नगर शायद
इसे ही कहते हैं !
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सामने विस्तार ही विस्तार है
दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
पता नहीं!
पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है |
पहाड़ जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बताना मुश्किल है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है |
पर आसमान है |
और दूर तक है
इतनी दूर तक कि उसका दूसरा सिरा कहाँ है
मुझे नहीं दीखता...
शायद अनंत में होगा ...मुझे क्या ?
बारवीं मंजिल पर बैठ
शीशे कि दीवारों से
हर रोज़ देखती हूँ ये विस्तार
और हर रोज़ ही महसूसती हूँ
अपने भीतर कुछ घुटता हुआ ...
"महा"-नगर शायद
इसे ही कहते हैं !
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kya ghut raha hai? ;)
ReplyDeleteसरल से शब्दों में आपने भर ली है ऊँची उड़ान
ReplyDeleteआसमां में जा ढूँढ आयीं महानगर की 'शान'
बारवीं मंजिल पर बैठ न हों यूँ हीं परेशान
जरा आईये जमीं पे मिलेगी सच्ची मुस्कान
आपकी प्रस्तुति लाजबाब है.मैंने तो बस यूँ ही कुछ
तुकबंदी कर दी है.बुरा न मानियेगा,प्लीज.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,आपका हार्दिक स्वागत है.
खूबसूरत रचना ..महानगर में रहने वालों की स्थति ...सटीक वर्णन
ReplyDeleteअभी 'अनुरानन' पूरी करने बैठा हूँ, उसके पहले ये पढ़ा:
ReplyDeleteपर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है |
पहाड़ जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बताना मुश्किल है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है |
सुना है नींदें हर ख्वाब का हिसाब माँगती हैं, और ये भी कि कुछ शहर अब सोया नहीं करते।
उदास खूबसूरती है इस कविता में।
यही महानगर है,
ReplyDeleteहर व्यक्ति दौड़ रहा है,
कुछ पाना चाहता है शायद हर कोई...
क्या पाना चाहता है?
मुझे तो समझ नहीं आता,
तुम पूछना
शायद उत्तर मिल जाए मुझे भी बताना
बहुत अच्छी कविता वर्तिका... you get one more person added to your fan club :)
और कविताओं के इंतज़ार में
---प्रांजल श्रीवास्तव
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
ReplyDeleteआसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है
सुन्दर और अत्यंत प्रभावशाली रचना
जी हाँ इसी को महा नगर कहते हैं
यहाँ सब मिलता है, स्वयं खो जाता है।
ReplyDeleteghuto mat meri jaan.....utho chalo paar karte hain ye samander aur chadh kar dekhte hain un pahadon ke paar kya hai...
ReplyDeleteghutna bilkul nahi hai samjhi...
is uthan mein bhi to taaza hawa paane kaa koi jariyaa hogaa
ReplyDelete:)
ReplyDeleteऊंचे पहाड़ों से घिरा, समंदर के किनारों पर ठुमकता, लोकल ट्रेन की स्पीड-सा भागता, ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों से (सड़कों पर खिलौनों-सी भागती गाड़ियों को) झांकता, झोपरपट्टियों में नालों और कीचड़ से होकर चलता, झमाझम बारिश में भींगता यह शहर कमाल हो न हो, फ़िल्मी ज़रूर है.
ReplyDeleteघुंटने की बजाय चलो जीना शुरू करें...
अरसा हुआ....दूसरा सिरा ....गुमशुदा है ...ओर कमाल है कोई ढूँढने की कोशिश भी नहीं करता ....
ReplyDeleteतलाश में लोग खुद खो जाते है अच्छी रचना बधाई ....
ReplyDeleteमहानगरीय जीवन में बहुत कुछ खो भी जाता है - सार्थक प्रस्तुति
ReplyDeleteदूर तक फैला हुआ एक शहर है
ReplyDeleteजो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
बहुत अच्छी कविता.
bahut hui achi rachna ,,,,
ReplyDeletejhai hind jai bharat
सार्थक रचना....
ReplyDeleteबहुत खूबसूरत प्रस्तुति , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , आभार
ReplyDeleteकृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें
जहाँ संवेदना बाजार से हार जाये वाही महानगर होता है. भावुक रचना.
ReplyDeleteयदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/
सार्थक रचना, सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.
ReplyDelete"शुभ दीपावली"
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मंगलमय हो शुभ 'ज्योति पर्व ; जीवन पथ हो बाधा विहीन.
परिजन, प्रियजन का मिले स्नेह, घर आयें नित खुशियाँ नवीन.
-एस . एन. शुक्ल