Thursday, May 31, 2007

तुम और मैं

मैं शब्द बन पन्नों में कैद हो ,

तुम्हारे भावों को स्वच्छंदता दे सकती हूँ

पर उसके लिए तुम्हे मुझे ,

अपने मन के भीतरी गलियारों से भी परिचित कराना होगा ।

मैं नदी बन अपना अस्तित्व खोकर ,

तुम्हे अस्तित्व दे सकती हूँ

पर उसके लिए तुम्हे सागर बन

मुझे खुद में समाने देना होगा ।

मैं पंछी बन सिर्फ तुम्हारे आँगन में

बसेरा कर सकती हूँ ,

पर उसके लिए तुम्हे मेरे पर कतरना छोड़ ,

अपने विशवास का विस्तार कर , मेरा आकाश बनना होगा ।

मैं सीपी बन अपनी तृष्णा को चिरकाल तक

अधरों पर जीवित रख सकती हूँ

पर उसके लिए तुम्हे भी स्वाति की बूँद बन ,

सदैव मेरे विश्वास को जीवित रखना होगा ।

मैं तारा बन तुम्हारा ख्वाब पूरा करने को

टूट सकती हूँ

पर उसके लिए तुम्हे भी विश्वास भरी निगाह बन

मुझे भीड़ में भी ढूँढ निकालना होगा ।

मैं संध्या का सूरज बन अपना अरुणिम आँचल

सिर्फ तुम पर लहरा सकती हूँ ,

पर उसके लिए तमहे भी क्षितिज बन ,

बिना मेरी पावनता का प्रमाण मांगे

मुझे अपनाना होगा ।

मैं तुम्हें तुमसे बेहतर

समझ सकती हूँ ,

पर उसके लिए पहले , मुझे “तुम ” ,

और तुम्हें “मैं ” होना होगा ।