मैं शब्द बन पन्नों में कैद हो ,
तुम्हारे भावों को स्वच्छंदता दे सकती हूँ
पर उसके लिए तुम्हे मुझे ,
अपने मन के भीतरी गलियारों से भी परिचित कराना होगा ।
मैं नदी बन अपना अस्तित्व खोकर ,
तुम्हे अस्तित्व दे सकती हूँ
पर उसके लिए तुम्हे सागर बन
मुझे खुद में समाने देना होगा ।
मैं पंछी बन सिर्फ तुम्हारे आँगन में
बसेरा कर सकती हूँ ,
पर उसके लिए तुम्हे मेरे पर कतरना छोड़ ,
अपने विशवास का विस्तार कर , मेरा आकाश बनना होगा ।
मैं सीपी बन अपनी तृष्णा को चिरकाल तक
अधरों पर जीवित रख सकती हूँ
पर उसके लिए तुम्हे भी स्वाति की बूँद बन ,
सदैव मेरे विश्वास को जीवित रखना होगा ।
मैं तारा बन तुम्हारा ख्वाब पूरा करने को
टूट सकती हूँ
पर उसके लिए तुम्हे भी विश्वास भरी निगाह बन
मुझे भीड़ में भी ढूँढ निकालना होगा ।
मैं संध्या का सूरज बन अपना अरुणिम आँचल
सिर्फ तुम पर लहरा सकती हूँ ,
पर उसके लिए तमहे भी क्षितिज बन ,
बिना मेरी पावनता का प्रमाण मांगे
मुझे अपनाना होगा ।
मैं तुम्हें तुमसे बेहतर
समझ सकती हूँ ,
पर उसके लिए पहले , मुझे “तुम ” ,
और तुम्हें “मैं ” होना होगा ।