Wednesday, May 04, 2016

खेल अब ये बिगाड़ना है मुझे

--------------------------------------------------------
उसने कुछ यूँ रिहा किया है मुझे
जैसे ख़ुद में पिरो रहा है मुझे
खेल अब ये बिगाड़ना है मुझे
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’
लत न लग जाए ख़ाब की, बचना
मेरी नींदों का मशविरा है मुझे
उतरा सागर उदास लगता है
चाँद पानी में घोलना है मुझे
मैं ने ही तो बिछाई है ये बिसात
अपने अंजाम का पता है मुझे
यां की आबो-हवा भली है अभी
तितलयों ने बता दिया है मुझे
और गहरे हुए मिरे अक्षर
तुम ने जब भी मिटा दिया है मुझे
उसने यादें उधेड़ कर मेरी
अपने स्वेटर में बुन लिया है मुझे
कैक्टस जैसी याद हूँ और वो
रोज़ अश्कों से सींचता है मुझे
मुझ को हैरत है किस लिए ये घर
रोज़ हैरत से देखता है मुझे
मेरा हर वार जानता है वो
उसकी हर ढाल का पता है मुझे
--------------------------------------------------------

No comments: