Sunday, May 24, 2009

कोई कविता मुझसे फूटती क्यूँ नहीं


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जाने क्या हुआ है मुझे
कि अब कोई कविता मुझसे
फूटती ही नहीं!

संवेदनाएं ख़त्म हो चली हैं
ऐसा भी नहीं
विचारों की पोटली में
अब भी जाने कितने ही विचार हैं
जो गुमनामी के अंधेरों को पीछे छोड़
जग जाहिर होने को
उछल रहे हैं ….

पर हाँ, कविता में बंधना
अब उन्हें स्वीकार्य नहीं

शायद वे डरते हैं.
हाँ! वे डरते ही हैं….
पर बंधनों से नहीं!

‘पारस्परिक स्वीकृति से बुने गए बंधन
उन्मुक्तता देते हैं, संकुचन नहीं’
इतनी समझ तो उन्हें भी है

सो यह डर बंधनों का नहीं
बल्कि उस वक़्त का है
जिसका अंजाम वे अभी
मेरे ‘मौन’ के रूप में
देख रहे हैं

वह वक़्त,
जब ‘वक़्त’ एकबार फिर अपनी
कुटिल चाल बदलकर
उन्हें बंधन-मुक्त कर देगा
और छीन लेगा
वह उन्मुक्तता
जिसकी तब तक उन्हें
‘आदत’ पड़ गयी होगी

और हाँ!
वक़्त के इस निर्णय में
किसी पारस्परिक तो क्या
आंशिक स्वीकृति की भी
गुंजाईश ना होगी

आखिर वक़्त को तो
बाद्शाहियत की आदत है
‘राय-मशवरे, स्वीकृति-अस्वीकृति’
यह सब तो उसे
‘वक़्त-बर्बादी’ के नुमाइंदे
नज़र आते हैं

सो,
ऐसे में
अब तुम ही कहो
अंजाम जानकार भी
भूल दोहराने का गुनाह
कोई क्यूँ करे….?
और उसके ऐसा ना करने पर
मैं उससे शिकायत भी करूं
तो कैसे………..?????

इसलिए कहती हूँ
के ‘गर जवाब हो….
तो ही मुझसे दुबारा पूछना
कि “क्या हुआ है मुझे?
अब कोई कविता मुझसे
फूटती क्यूँ नहीं?”

अन्यथा छोड़ देना
मुझे मेरे
मेरे ही हाल पर
मेरे मौन के साथ…..
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10 comments:

venus kesari said...

आखिर वक़्त को तो
बाद्शाहियत की आदत है
‘राय-मशवरे, स्वीकृति-अस्वीकृति’
यह सब तो उसे
‘वक़्त-बर्बादी’ के नुमाइंदे
नज़र आते हैं

सुन्दर भाव, अच्छी कविता
वीनस केसरी

satish kundan said...

जाने क्या हुआ है मुझे
कि अब कोई कविता मुझसे
फूटती ही नहीं...............मन की भावनाओं को बहुत खूबसूरती से शब्दों में पिरोया है आपने....बधाई !!!! मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है......

VaRtIkA said...

@ venus ji nd satish ji.... aap dono kaa hi tah-e-dil se dhanyawaad....

Kishore Choudhary said...

वर्तिका, बेहद सुन्दर लेखन है, आज ही ब्लॉग देखा है तो पाया कि विविधता से पूर्ण ओरिजनल काम है यहाँ. लगभग सभी विधाओं में निपुणता से लिखा गया है हालाँकि मैंने उतनी गहराई से नहीं पढ़ा है फिर भी जो देखा वह पसंद आया है. इसे जारी रखने का प्रयास रखना कई बार हम कम फीडबैक से ऊबने लगते हैं पर मेरा मानना है कि अच्छा लिखा हुआ खोज के भी पढ़ते हैं पाठक.

●๋• सैयद | Syed ●๋• said...

बहुत खूब !!

अशोक लव said...

अब भी जाने कितने ही विचार हैं
जो गुमनामी के अंधेरों को पीछे छोड़
जग जाहिर होने को
उछल रहे हैं ….
sundar panktiyaan hain .man kee chhatpataahat ko shabdon ka sundar roop diya hai.

VaRtIkA said...

@kishor ji...mujhe khushi hai ki aapne apna anmol samay diya iss blog par.... main koshish karoongi ki yeh jaari rahe...aur haan feedbcks ke liye likhna shuru nahin kiya tha to shayad unki kami ki vajah se likhna chodongi bhi nahin.... prayaas jaari rahega ki vividhta bani rahe... main dil se shukr guzaar hoon ki aap mera lekhan pasand aaya... umeed hai aapse yahan mulaqat hoti rahegi...

VaRtIkA said...

@syed ji and ashok ji...aap dono kaa hi hardikl dhanywaad...:)

गौरव said...

m again speechless.........

Avinash Chandra said...

Pata hai, ise kai baar padh chuke ham...par har baar abole laute...kabhi kabhi nahi kahna chahiye...

"nadi pahadon se footti hai...samandar se nahi.."
samajh gayi hongi aap :)

Standing ovation :)