Saturday, March 06, 2010

खामोशी:: यहाँ पसरी खामोशी को तोड़ने का एक प्रयास मात्र

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बरसों से ख़ामोशी खानाबदोश हुआ करती थी |

मेरी कठोर हंसी उसे घर बनाने ही कहाँ देती...!

जब भी उतरती फिज़ा में,

एक छनाके के साथ उतरती

और एक ही झटके में

चकनाचूर कर डालती,

चुप्पी की

आखिरी ईंट तक!


पर देखो,

अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है

यह हमारे दरमयां........

यकीं जो है इसे भी ,

के अब जो तुम चले गए हो

कभी ना लौटने की खातिर

तो रुख न करेगी इधर का

यह कमबख्त हंसी भी

दुबारा कभी


ख़ामोशी को है घर मिल गया

और मेरी हंसी

खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब........!

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14 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

संजय भास्कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

रोहित said...

baut aachi kavita...........

Ravi Rajbhar said...

Bahut dard hai shabdo men...vartika jee,
rachna bahut hi sunder bani hai..

अलीम आज़मी said...

bahut hi khoobsurat andaaz me har alfaaz ko sahi dhang se sajaaya hai ... jo har ek rachna apni khasiyat liye hue ....bahut umda aapne likha hai ....
waqt mile aap hamare blogs par aakar hamari hausala afzai kare aapka roz aana hame inspire karegi ...shukriya
best regards
aleem
htt://aleemazmi.blogspot.com

Avinash Chandra said...

अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है

यह हमारे दरमयां........

behad khubsurat shabd.....kitna kuchh kaha is khaamoshi ne...behtareen rachna hamesha hi ki tarah kamaal

Serious Writers said...

Mere zakhm-e-dil jaavidaa.n reh gaye hain...
.
Sach bahut dard hai is nazm mein aur zyaadaa dil ke saath saath thoda dimag bhi lagaya hai aapne...last mein hit dene keliye. Bahut achchhi nazm. badhai.

--Gaurav

Pankaj Upadhyay (पंकज उपाध्याय) said...

काफ़ी दिनो बाद आयी हो सो खामोशी को ठिकाना मिल गया वो तो समझा मुझे..

दोनो को साथ रहने दो.. कौन कहता है कि हसी को आवाज चाहिये..खामोश हसी हसती रहो.. :)

हमेशा की तरह सुन्दर रचना... देर से आने के लिये फ़ाइन लगना चाहिये.. :)

boletobindas said...

ख़ामोशी को है घर मिल गया
और मेरी हंसी
खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब........!


हंसी खानाबदोश हो जाती है तो फिर उसे बांधना काफी मुश्किल होता है......खोई हंसी को पाना भगवान ढ़ढने सा हो जाता है..

प्रवीण पाण्डेय said...

उत्श्रंखलता और नीरवता दोनो मनस के आगन्तुक हैं । बारी बारी आने दें, भारीपन नहीं रहेगा ।

सुमन'मीत' said...

ख़ामोशी को है घर मिल गया


और मेरी हंसी

खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब........!

वाह क्या लिखा है आपने

abhi said...

एक दो बातें कुछ मेरे दिल की भी इस कविता में दिखाई परती है...बेहद लाजवाब..सुन्दर प्रस्तुति

M VERMA said...

ख़ामोशी को है घर मिल गया


और मेरी हंसी

खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब........!
बेशक खानाबदोश सी फिर रही हो हंसी पर इन्हें अनायास ही कहीं भी कभी भी आते रहना होगा. शायद चुप्पी को यही जवाब काफी है.
तारीफ मे शब्द कहाँ हैं मेरे पास

sangeeta swarup said...

:):)

ये मैंने पढ़ी हुई है पहले भी....बहुत खूबसूरत है .
हंसी का खानावादोश सी फिरना...ये प्रयोग बहुत अच्छा लगा.