Thursday, May 19, 2011

"महा"-नगर

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सामने विस्तार ही विस्तार है

दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
पता नहीं!

पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है...
पहाड़, जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बमुश्किल ही बताया जा सकता है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें सदियों से उल्टा लटका रखा है |

पर आसमान है |
और दूर तक है
इतनी दूर तक कि उसका दूसरा सिरा कहाँ है
मुझे नहीं दीखता...
शायद अनंत में होगा ...मुझे क्या ?

बारवीं मंजिल पर बैठ
शीशे कि दीवारों से
हर रोज़ देखती हूँ ये विस्तार
और हर रोज़ ही महसूसती हूँ
अपने भीतर कुछ घुटता हुआ ...

"महा"-नगर शायद
इसे ही कहते हैं !

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21 comments:

विकास कुमार said...

kya ghut raha hai? ;)

Rakesh Kumar said...

सरल से शब्दों में आपने भर ली है ऊँची उड़ान
आसमां में जा ढूँढ आयीं महानगर की 'शान'
बारवीं मंजिल पर बैठ न हों यूँ हीं परेशान
जरा आईये जमीं पे मिलेगी सच्ची मुस्कान

आपकी प्रस्तुति लाजबाब है.मैंने तो बस यूँ ही कुछ
तुकबंदी कर दी है.बुरा न मानियेगा,प्लीज.
मेरे ब्लॉग पर आईयेगा,आपका हार्दिक स्वागत है.

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरत रचना ..महानगर में रहने वालों की स्थति ...सटीक वर्णन

Avinash Chandra said...

अभी 'अनुरानन' पूरी करने बैठा हूँ, उसके पहले ये पढ़ा:

पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है |
पहाड़ जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बताना मुश्किल है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है |

सुना है नींदें हर ख्वाब का हिसाब माँगती हैं, और ये भी कि कुछ शहर अब सोया नहीं करते।
उदास खूबसूरती है इस कविता में।

Fatte said...

यही महानगर है,
हर व्यक्ति दौड़ रहा है,
कुछ पाना चाहता है शायद हर कोई...
क्या पाना चाहता है?
मुझे तो समझ नहीं आता,
तुम पूछना
शायद उत्तर मिल जाए मुझे भी बताना

बहुत अच्छी कविता वर्तिका... you get one more person added to your fan club :)
और कविताओं के इंतज़ार में
---प्रांजल श्रीवास्तव

M VERMA said...

या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है
सुन्दर और अत्यंत प्रभावशाली रचना
जी हाँ इसी को महा नगर कहते हैं

प्रवीण पाण्डेय said...

यहाँ सब मिलता है, स्वयं खो जाता है।

Fauziya Reyaz said...

ghuto mat meri jaan.....utho chalo paar karte hain ye samander aur chadh kar dekhte hain un pahadon ke paar kya hai...

ghutna bilkul nahi hai samjhi...

Sonal Rastogi said...

is uthan mein bhi to taaza hawa paane kaa koi jariyaa hogaa

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

:)

मनरागी said...

ऊंचे पहाड़ों से घिरा, समंदर के किनारों पर ठुमकता, लोकल ट्रेन की स्पीड-सा भागता, ऊंची-ऊंची बिल्डिंगों से (सड़कों पर खिलौनों-सी भागती गाड़ियों को) झांकता, झोपरपट्टियों में नालों और कीचड़ से होकर चलता, झमाझम बारिश में भींगता यह शहर कमाल हो न हो, फ़िल्मी ज़रूर है.

घुंटने की बजाय चलो जीना शुरू करें...

डॉ .अनुराग said...

अरसा हुआ....दूसरा सिरा ....गुमशुदा है ...ओर कमाल है कोई ढूँढने की कोशिश भी नहीं करता ....

Sunil Kumar said...

तलाश में लोग खुद खो जाते है अच्छी रचना बधाई ....

राकेश कौशिक said...

महानगरीय जीवन में बहुत कुछ खो भी जाता है - सार्थक प्रस्तुति

virendra said...

दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...

बहुत अच्छी कविता.

SAJAN.AAWARA said...

bahut hui achi rachna ,,,,
jhai hind jai bharat

sushma 'आहुति' said...

सार्थक रचना....

S.N SHUKLA said...

बहुत खूबसूरत प्रस्तुति , सुन्दर भावाभिव्यक्ति , आभार

कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारें

एक स्वतन्त्र नागरिक said...

जहाँ संवेदना बाजार से हार जाये वाही महानगर होता है. भावुक रचना.
यदि मीडिया और ब्लॉग जगत में अन्ना हजारे के समाचारों की एकरसता से ऊब गए हों तो कृपया मन को झकझोरने वाले मौलिक, विचारोत्तेजक आलेख हेतु पढ़ें
अन्ना हजारे के बहाने ...... आत्म मंथन http://sachin-why-bharat-ratna.blogspot.com/

S.N SHUKLA said...

सार्थक रचना, सुन्दर प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें.



"शुभ दीपावली"
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मंगलमय हो शुभ 'ज्योति पर्व ; जीवन पथ हो बाधा विहीन.
परिजन, प्रियजन का मिले स्नेह, घर आयें नित खुशियाँ नवीन.
-एस . एन. शुक्ल

Lost said...

People say time continues......it changes......I agreed before but not now.

People remains same....time remains static........pain remains there always till the life ends, till hearts stop pounding inside ribs........


लोग कहते थे वक्त बदल जाता है और इंसान भी,
कभी मान लिया करता था मैं भी,

पर अब नहीं,

लोग भी वही,
समय भी वही और दर्द भी वही,
जब तक साँसे और धड़कन है, कुछ नहीं बदलता,
बदल जाते हैं तो बस जगह और नजरिया.............