Wednesday, February 13, 2013

गुड-नून

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झुग्गियां, परछाइयां है महलों की
उखाड़ फेखने से ख़त्म नहीं होंगी ।
न ही ख़त्म होंगी वो
महलों को गिरा देने से,
क्यूंकि हर महल, खुद किसी
दूसरे बड़े महल की परछाई है ।

सो 'गर चाहते हो
कि न रहे झुग्गियां बाकी
तो उठाओ वो सूरज,
जो अभी किसी 'halo' सा चमकता है,
और रख दो उसे
संसार के सर के ठीक ऊपर 
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* halo = तेजोमंडल, प्रकाश-चक्र

6 comments:

mridula pradhan said...

क्यूंकि हर महल, खुद किसी
दूसरे बड़े महल की परछाई है ekdam theek......

Manav Mehta 'मन' said...

bahut badhiya ...

प्रवीण पाण्डेय said...

बहुत हगरी पंक्तियाँ, सूरज जितना ऊपर जायेगा, उतनी परछाईयाँ सिकुड़ जायेंगी।

वर्तिका said...

@ mridula pradhan, manav mehta, praveen pandey..... bahut bahut shukriya aap sabhi kaa :)

Anonymous said...

पुरे 1 साल 8 महीने 3 हफ़्ते और 4 दिन (कुल 636 दिन) के बाद पोस्ट किया है।

M VERMA said...

गहन अनुभूति की रचना