Saturday, October 11, 2008

नाप

जानते हो,
जब भी कभी बाज़ार जाती,
और कोई सपना पसंद आ जाता
तो झट उसे खरीद लेती
तुम्हारी खातिर !

उस ज़माने में
तुम्हारा कद तो
तेजी से बढा करता था
पर फिर भी
तुम्हारा नाप लेने की
कभी ज़रूरत नहीं पड़ी मुझे।

अब भी जब कभी
वो रास्ता भटक जाती हूँ
और नुमाइश पे लगे
रंग -बिरंगे सपनो पर
नज़र कहीं अटक जाती है,
तो दिल मचल कर कह उठता है,
“खूब फबेगा ये उस पर ”

पर अब मैं
झट उसे खरीदती नहीं
रोक लेती हूँ खुद को,
और लौट आती हूँ...
खाली ही हाथ

के अब मेरे खरीदे हुए सपने
तुम्हें फिट नहीं आते।
बड़े जो हो गए हो तुम !

कद तो बढ़ता नहीं अब तुम्हारा
पर सपनों का नाप
हर दिन बदल जाया करता है…।

Sunday, June 22, 2008

बदलाव

कभी कभी तुम पर
क्रोध आता है
तो कभी दिल दर्द से
डूबा जाता है

"जाने कैसे होगे तुम"
ये सोच कभी चिंता करती हूँ
तो कभी अपनी असमर्थता पे
चिढ़ती हूँ, कुढ़ती हूँ

घटना, सिर्फ एक-----
तुम्हारा मुझे छोड़ ,
दूर चले जाना
और उस एक घटना के लिए
मेरी अनेक प्रतिक्रियाएं

सच ही तो है
'दिल चंचल होता है'
वक़्त के साथ 'गर
मेरे ही दिल का मौसम बदल गया
तो मौसम के साथ यदि
मेरे प्रति तुम्हारी भावनाएँ भी
बदल गयीं,
तो इसमें
तुम्हारा क्या दोष?

आखिर इंसान का दिल है
बदलाव तो मांगेगा ही...........

Saturday, June 21, 2008

WARRANTY CARD

नया T.V. खरीदा
चला नहीं,
तो जाकर बदल आई

ऐसे ही कुछ बरसों पहले
एक बड़े से शोरूम से
भगवान् की एक मूरत
खरीद लायी थी
तब से रोजाना
सर झुकाती आ रही हूँ
उसके आगे
पर आज तक उसने मेरी
कोई दुआ नहीं सुनी
न ही कोई अर्जी
कुबूल की है

सोचती हूँ
बदल आऊं उसे भी एक रोज़
पर क्या करुँ
खुदा आता नहीं
WARRANTY CARD के साथ.

Sunday, April 20, 2008

gathri


यूँ यहाँ फर्श पर पड़ी हूँ
अपने ही पाँव आपस में गूँथ,
सर घुटनों पे टिका
ख़ुद को ख़ुद में ही
समेटती जाती हूँ
जैसे कोई गाँठ लगा रहा हो,
किसी गठरी में!

हाँ,
गठरी ही बना लिया है मैंने ख़ुद को
तुम्हारे जाने के बाद
और समेट कर बाँध लिया हैं
तुम्हारी यादों को
जो अब तक मेरे भीतर
करीने से सजी मिला करती थी

के सुना था कभी
‘गठरियों में धरा सामन
आसानी से नहीं मिलता'

फ़िर क्यूँ लोग अब भी मुझे देखते ही
तुम्हें मुझमे ढूँढ ही लिया करते हैं ??