Thursday, June 11, 2009

लेन-देन

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आज मैंने बादल को
टूट टूट कर बरसते देखा
और साथ ही देखा
प्यासी धरा को
उसका हर कण अपने आँचल में
समेटते हुए

और रात ही तो देखा था मैंने
चांदनी को पिघल पिघल कर
टपकते हुए
और साथ ही देखा था
फूल, दूब, झरने, गिरी, सभी को
उसकी बूँद बूँद आतुरता से
पीते हुए

और वो झुलस झुलस कर जलता हुआ सूरज
जिसे देख रही थी मैं उस रोज़
और साथ ही देख रही थी
इस संसार के कण कण को
उसकी किरण किरण
सहेजते हुए

और ये नदी
जो मीलों का फासला तय कर
बस सागर से मिलने की आस लिए
चलती ही जाती है
इसे भी तो मैं सदियों से देखती आ रही हूँ
और साथ ही देखती आ रही हूँ
इस अनंत समुद्र को
जो सिर्फ इसे सीने से लगाने की खातिर
जाने कबसे बाहें फैलाए बैठा हुआ है

और ये बोझिल हवा
जो टूटती साँसों के साथ भी
दौड़ती ही जाती है
इसे भी तो देख रही हूँ मैं अभी
और साथ ही देख रही हूँ
ज़िन्दगी को
इसे अपनी हर सांस में
भरते हुए


आज…...कल शाम……उस रोज़……अभी….
आज-तक जाने कितने ही लेन-देन देखे हैं मैंने
इस दुनिया में
और पाया है यही
कि कुछ दे सकने के लिए
लेने वाले का भी कुछ प्रयास
आवश्यक है

भला उस भिक्षुक को कोई भिक्षा भी कैसे दे
जिसके हाथ में कटोरा तक ना हो !

इसलिए कहती हूँ प्रियतम
कि मैं खुद को पूर्णतः
तुम्हें सौंप सकूं
इसके लिए कम से कम
अपनी मूक स्वीकृति तो दे देना ....!!!



I would like to thank one of my dear frndz Vikash Kumar for contributing to this poem,"भला उस भिक्षुक को कोई भिक्षा भी कैसे दे, जिसके हाथ में कटोरा तक ना हो !" . Thank you so mch Vikash for ur input. you have always been the best critic and support... :)

17th Oct, 07

7 comments:

Asha Joglekar said...

बहुत ही खूबसूरती से प्रकृति के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ती की है आपने ।

satish kundan said...

बहुत गहराई से आपने प्रकृति के विविध रूप को शब्दों में ढाला है..और साथ में आपका प्रेम निवेदन लाजबाब है...ऐसे ही लिखते रहें.....मैंने भी एक नई पोस्ट डाली है आपका स्वागत है..

Vikash said...

"भला उस भिक्षुक को कोई भिक्षा भी कैसे दे
जिसके हाथ में कटोरा तक ना हो !" :) :)

Gagan said...

I was reading it and thinking where this poem is heading and how it is relating with subject..your last lines were power punch...I read it and said Oh my goodness...
too good your writing is awesome!!

Anonymous said...

bahut sunder rachana. prakriti ka bharpoor upyog.
shandar

वर्तिका said...

aap sabhi ki main haardik aabhari hoon...

Rangnath Singh said...

bura na maniyega gar ye kahu ki kavita ki puchh ne uske saundarya ko bagad diya h.

ise apni sans me bharte huye par kavita ko kat kar alagpage par likh lijiye aur waha tak ki kavita ko alag se padhiye. dono me kaun si behtar klagi batayegaa.