Tuesday, September 08, 2009

हिसाब का गणित


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तुम थे
तब सोचा करती थी
कि चले जाओगे
तब सोचेंगे
कि क्या खोया
और क्या पाया

अब
जब तुम नहीं हो
जाने कबसे
ज़िन्दगी का बही खाता
लिए बैठी हूँ...
और हिसाब का गणित
याद ही नहीं आता......

कहीं तुम जाते जाते
मेरी ज़िन्दगी को
शून्य से भाग तो नहीं दे गए...???

12 comments:

Pankaj Upadhyay said...

ज़िन्दगी गणित नही है, कला है...न जाने लोग क्यू ज़िन्दगी हिसाब किताब मे खराब करते है...

अच्छा है जो याद नही आ रहा :) आप काफ़ी अच्छा लिखती है..आप ’कविता’ कम्म्युनिटी वाली वर्तिका जी है न??

VaRtIkA said...

:) har kalaa kaa apnaa ganit hota hai, aur har ganit ki apni kalaa....

besides zindagi kharaab ki hi nahin jaa sakti... all u do is u spnd life...u never waste it...u just cant....

aapki tipni dekhkar behad khushi hui... thnks a ton... :) aur haan hum kavita community waali vartika hi hain... :)

क्रिएटिव मंच said...

अत्यंत सारगर्भित रचना
सहेज के रखने वाली कविता
बहुत सुन्दर
आभार


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क्रियेटिव मंच

M VERMA said...

कहीं तुम जाते जाते
मेरी ज़िन्दगी को
शून्य से भाग तो नहीं दे गए...???
वाह क्या बात है. चलो अच्छा है कि शून्य से भाग दिया और आप अनंत हो गयी.
नए अन्दाज की रचना बहुत अच्छी लगी.

Dr. Amarjeet Kaunke said...

सुन्दर कविता.....

संजय भास्कर said...

bahut hi sunder kavita



htttp://sanjaybhaskar.blogspot.com

सागर said...

अच्छा पंच मारा... बेसुध कर दिया जाते जाते

Gaurav Sharma said...

Vartika Ji,

Behtreen se kam main kya kahun...
.
कहीं तुम जाते जाते
मेरी ज़िन्दगी को
शून्य से भाग तो नहीं दे गए..
.
Nazm ke aakhir me yeh zabardast 'hit'! Hats off to you!

--Gaurav

Deepali Sangwan said...

haan, sahi kaha..
bahut shaandar nazm kahi hai, behtareen..

poemsnpuja said...

kavita aur ganit ka khoobsoorat combination :)

"In Search of...." said...

kahin ghoom phir kar aapke blog pe aaya to thoda thithka aur is kavita ki aakhiri panktiyaan padhin .. socha ki baat ki gahraayi to samander se prtiyogita kar sakati hai ..

ek viraam sa la diya is ganit ne ...

निर्झर'नीर said...

marmsparshi bhaav ..kam shabdon mein bhavo ko khoob piroya hai daad hazir hai