Thursday, May 19, 2011

"महा"-नगर

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सामने विस्तार ही विस्तार है

दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
पता नहीं!

पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है |
पहाड़ जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बताना मुश्किल है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें उल्टा टाँग दिया है |

पर आसमान है |
और दूर तक है
इतनी दूर तक कि उसका दूसरा सिरा कहाँ है
मुझे नहीं दीखता...
शायद अनंत में होगा ...मुझे क्या ?

बारवीं मंजिल पर बैठ
शीशे कि दीवारों से
हर रोज़ देखती हूँ ये विस्तार
और हर रोज़ ही महसूसती हूँ
अपने भीतर कुछ घुटता हुआ ...

"महा"-नगर शायद
इसे ही कहते हैं !

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Tuesday, April 12, 2011

जड़ें

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बहुत फैलीं हैं 
तेरी यादों कि  जड़ें

बरसात चाहे ज़हन के
जिस भी हिस्से में हो
पर जो ग़म हरा हुआ है 
तेरे नाम का ही रहा है 

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Tuesday, March 15, 2011

उदास दोपहरें

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छोटी थी,
तो अक्सर देखा करती थी
माँ को
उस उपर वाली दुछत्ती पे धरे
संदूक को उतार
उस की एक एक चीज़
फिर से खोल-तह, झाड पोंछ, सईहारते !
यह उसकी दैनिक नहीं
तो कम से कम
साप्ताहिक दिनचर्या का अंग तो था ही 

यूँ तो उस संदूक में धरी
कोई भी चीज़
इंच भर भी
इधर से उधर नहीं हुई होती
और होती भी कहाँ से
दुछत्ती इतनी ऊंची थी
कि उस तक पहुँचने के लिए
माँ को भी
सबसे ऊंची वाली मेज के ऊपर
कुर्सी रख कर चढ़ना पड़ता...
...और फिर सबको पता था
कि उस संदूक में
नेपथलीन की गंध में तह किये
पुराने कपड़ों के सिवाय
और
कुछ है भी नहीं.... |

पर फिर भी माँ उसे
अक्सर ही उतारती
और अपनी सारी दोपहर
उसके साथ ही बिता देती...

हाँ, माँ इस काम के किये खासतौर पर
दोपहरें ही चुना करती ...
...वो उदास दोपहरें |
अब यह कहना थोडा मुश्किल है
कि माँ उदास दोपहरें चुना करती थी...
या माँ को उदास देखकर
दोपहरें खुद ही उदास हो जाया करतीं...
पर हाँ, वो दोपहरें उदास होतीं ...

सच....उस वक़्त दूसरों की तरह
मुझे भी यही लगता था
कि माँ को काम करने की आदत है
और इसीलिए वो काम ना होने पर भी
काम ढूंढ लिया करती है
पर अब
जब खुद उस पड़ाव पर आ पहुंची हूँ
जहाँ ना तो नाखूनों पर चावल दे जाने वाले बगूलों ( माना जाता था कि इससे ख्वाहिशें पूरी होती हैं)
की अहमियत रह गयी  है
ना ही जिद्द करने की उम्र
और जहाँ ख्वाहिशें अक्सर
भविष्य के नाम लिखे
वर्तमान के किसी संदूक के हवाले कर दी जाती हैं,
बड़े एहतियात से...
तब जा कर समझ आया है
कि उन् उदास दोपहरों की उदासी
आती कहाँ से थी.... 

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Tuesday, November 30, 2010

एक पुराना सवाल ... एक पुराना ख़याल...

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कैसे खड़ी हो जाती हैं
वहाँ दीवारें
मजहबों की
जहाँ दबी होती हैं
आहें, आंसू, सिसकियाँ  

कमज़ोर नहीं पड़ती
सीली ज़मीं पे रखी नीवें....?
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Sunday, July 18, 2010

रिश्वतखोर खला की परतें ...

जानती हूँ
कुसूर तेरा नहीं खुदाया
जो दुआओं में मेरी
असर ना हुआ

ये खला की सात परतें
जो दरम्यान खड़ी है ना,
...रिश्वतखोर बहुत हैं !

खा जाती होंगी
तुझ तक पहुँचने से पहले ही 
थोड़े अलफ़ाज़, थोड़ी शिकायतें,
और ढेर सारी मिन्नतें
जो रोज़ भेजती हूँ तुझे
धूप, अर्घ्य और नवैध के साथ...

ठीक वैसे ही
जैसे कुतर जाती हैं किनारे
हर रोज़ आसमान में टंगे
उस गोल चाँद के
जब वह
सब सय्यारों को टापता हुआ
मेरी खिड़की से कूद
मेरी कोठरी के फर्श पर उतरता है....

बेचारा ! चौकोर ही बचा होता है तब....|

रिश्वतखोर बहुत हैं ये खला की सात परतें ...!