Sunday, March 15, 2009

औपचारिकता

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अब भी
जब हम कहीं टकरा जाते हैं
तुम पूछ ही लिया करते हो
“कैसे हो”
मैं भी
झट कह देती हूँ
“अच्छी”

जानती हूँ
के जब तुम्हें ये जानना होगा
तब तुम्हें
मुझसे पूछने की
आवश्यकता ना होगी

पर अच्छा है,
औपचारिकता की ये दीवार
बनी ही रहे!!
हकीकत देख कर तुम
मुंह घुमा लो
तो पीडा अधिक होगी

दुर्घटनाओं के बाद का दृश्य
अक्सर
भयावय ही होता है …
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Wednesday, March 04, 2009

वक़्त बोलता है!

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मैं जब रूठ तुमसे
गुस्से में कह देती,
“तुम कभी याद न आओगे मुझे”

तुम भी जवाब कुछ यूं परोसा करते
“देखेंगे, वक़्त बोलेगा वो तो”

देखने के लिए अब तुम नहीं हो
सालों गुज़र गए तुम्हें गए
पर तुम्हारी दी हुई घडी की टिक-टिक
अब भी बंद नहीं होती

सच,
तुम्हारा दिया हुआ वक़्त
बोलता बहुत है… !!!
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Sunday, March 01, 2009

चौकडी


One of my friends, Rahul Raj, was trying to experiment with styles of poems and in turn he designed "चौकड़ी", a 4 liner poem, where the first three lines define the same object through different subjects (Science, Arts, Maths..). And the last one is a philosophical end to these.

Here is my first attempt to it...followed by a one in English by him. :)
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चाँद

खरबों किलोमीटर दूर होगा कोई मुझसे,
मेरे बेटे के खिलोने जैसा दिखता है जो,
फिर भी पूजती हूँ उसे, नत् होती हूँ,

खुद से ऊपर बैठा हर कोई बड़ा ही होता है.
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Wallet

So many murders for leather to preserve fate,
Handy, trendy, branded, I prefer it for my date,
My wallet is wet in tears, have recession in its eyes,

We shrink our life as we grow up in size.

(BY: Rahul Raj)

Friday, February 27, 2009

दंगे


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बातों बातों में बस्तियों की बस्तियां जल गयीं
खुदा और भगवान जो लड़ रहे थे शहर में

दो पत्थरों के टकराने से चिंगारिया निकलती हैं!
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Sunday, February 22, 2009

वारदातें


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रात टांगा था पूरा चाँद फलक पे,
जाने कौन बदल कर आधा रख गया :(

वारदातें अब बढ़ने लगी हैं शहर में!!
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BUDGET

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कद नाप के लाया था चादर अपनी,
आज ओढा तो पाया पैर उघारे थे

हरसू पहुँच जाते हैं चूहे BUDGET के !!
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Monday, February 09, 2009

मेरा पता

लोग यूं ही कहा करते हैं
मुझे अपना पता तक याद नहीं!

तेरी हर नज़्म तो मुंह ज़बानी याद है मुझे!!

Saturday, February 07, 2009

आरज़ू


हसरतें,
सपने,
कल्पनाएँ
और प्रेम...
सब समेट कर
हर रोज़
एक नज़्म लिखती हूँ
और फिर
उस नज़्म की नांव बना,
बहा देती हूँ,
आँखों के पानी में...

मेरे यहाँ
समंदर जो नहीं होता!

पर सुना है सारा पानी जाके
समंदर में ही
मिला करता है...|
सो यूं ही सही,
पर हो सकता है
मैं किसी रोज़ तुमसे
मिल सकूं!


सच,
तुमसे मिलने की
आरज़ू बहुत है...!!

Friday, February 06, 2009

खुदकुशी


मेरे बदन में
शिराएँ फैली हैं
सर से पाँव तक– हर ओर,
दूर तलक

कितना लंबा रास्ता है ये!
हांफ जाता होगा बेचारा मेरा लहू,
दौड़ते दौड़ते रोज़ाना

सोचती हूँ
एक शोर्ट-कट इख्तेयार कर दूं
और काट दूं कुछ शिराएँ अपनी

पर फिर रहने देती हूँ
के अभी रास्ता जाना पहचाना है
दौड़ना आसान होता होगा

और फिर अनजाने रास्तों पर
एक्सीडेंट का खतरा भी तो
बढ़ जाता है!
कहीं कुछ घट गया
तो खामखाँ मेरे सर
खुदकुशी का आरोप
मढ़ दिया जायेगा !


26th May, 08

Sunday, January 11, 2009

मुकम्मल कविता


दर्द का संपूर्ण कोश उडेल डाला
शब्दों का ढेर भी लगा दिया
दिल का कटोरा खुरच-खुरच कर
धड़कन को ही पन्नों पे सजा दिया

चलो,
अब इन्हें समेट लूं,
और दे आऊं
ठण्ड से कांपते
किसी बेघर बूढे को

बेचारा
इन्हें जलाकर
थोडा जीवन ईधन ही पा जाए
तो,
मेरी कविता
मुकम्मल हो जाए

दिल का भार तो अब भी
धरा का धरा रख्खा है….!!