Monday, March 16, 2015

कस्टम-फिट का समय और बुद्ध

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वो बड़ी-बड़ी आँखों वाली लड़की थी
हाँ, बड़े सपनों वाली नहीं,
बड़ी आँखों वाली
उसे तलाश थी अपनी,
वो देखना चाहती थी खुद को,
उससे ज़ियादा,
जितना उसका आइना उसे दिखता था
सो, अपनी उम्र के अलग अलग पड़ाव पर
उसने चुने कई अलग अलग आईने
जिनमें कई जोड़ी आँखें शामिल थीं...
माँ, बाबा, भाई, बहन, दोस्त,
समाज, तीन प्रेमी
और-तो-और घुंगराले बालों वाले उस अजनबी की भी
जिससे उसका बस अजनबियत का रिश्ता था

पर हर बार उसने यही पाया कि
हर रिश्ते ने क़तर दिया था उसका अक्स
अपने आमाप के अनुसार
रिश्ते अपने समय से अछूते जो नहीं होते
और ये मेड-तो-मेज़र और कस्टम-फिट का समय था
खैर, अब वो थक गयी है है अपने आधे अधूरे अक्स देख के
सो, अब मूँद ली हैं उसने आखें,
सी लिए हैं होठ
और इक कवच क तौर पर
सजा ली है एक अधूरी मुस्कान
काश! वो अपने कान भी बंद कर पाती
जो अब आलोचनाओं, और विलापों के बोझ से
दिन-ब-दिन लम्बे हुए जाते हैं
सचमुच, बुद्ध होना आसन नहीं!
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Saturday, March 07, 2015

प्रिजर्वेशन या हत्या?

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मत लिखो कोई कविता
कि तुम्हारे उसे कागज़ पर दर्ज करते ही
एक जीती जागती कविता दम तोड़ देगी
क्यूंकि वह यह जानती है कि
अब उसे कोई जियेगा नहीं,
गुजर जायेंगे लोग
उसे अनदेखा करते हुए
यह सोच कर कि अब वह
प्रेज़र्व कर ली गयी है कागजों में,
बना ली गयी हैं उसकी कई कई प्रतियाँ,
और वे लौट सकते हैं उस तक
अपनी सहूलियत और मर्ज़ी से
और साथ ही वह यह भी जानती है
कि कोई नहीं लौटता उनतक
जिनके खोने का डर नहीं होता

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Friday, December 20, 2013

चाँद-गेंद

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गेंद है कोई 
चाँद किसी बच्चे की शायद
जिससे किसी पडोसी की खिड़की का कांच
टूट गया था छन से इक शब
और खडूस पडोसी नें वो गेंद उसे लौटाई नहीं
उस बच्चे से दूर बहुत ही
आसमान की ताक़ पे रख दी.. 
उसी ताक़ पे चाँद गेंद सा लुढका करता है..​
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Sunday, April 14, 2013

ग़ज़ल में मेरी पहली कोशिश

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तुमको जब भी सोचा है
चुटकी में दिन बीता है

आ उलझा जो पेड़ों से
ठोकर खाया झोंका है

सहराओं में जाते ही
रस्ता रस्ता भूला है

जो तुझमें कोई ऐब नहीं,
फिर क्यूँ छिपता फिरता है?

दरिया में सूरज पिघला 
क्या वो बर्फ का गोला है?

दुनिया,दिल दोनों हों खुश
ख़ाब ये कितना महंगा है!

सूरज तेरे जलने से
शब का काजल बनता है

इतनी ठंढ औ इक बूढ़ा
कुहरा ओढ़े बैठा है

आँखें भी हैं नूर भी है
शह्र ये फिर भी अंधा है
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- वर्तिका

Wednesday, February 13, 2013

गुड-नून

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झुग्गियां, परछाइयां है महलों की
उखाड़ फेखने से ख़त्म नहीं होंगी ।
न ही ख़त्म होंगी वो
महलों को गिरा देने से,
क्यूंकि हर महल, खुद किसी
दूसरे बड़े महल की परछाई है ।

सो 'गर चाहते हो
कि न रहे झुग्गियां बाकी
तो उठाओ वो सूरज,
जो अभी किसी 'halo' सा चमकता है,
और रख दो उसे
संसार के सर के ठीक ऊपर 
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* halo = तेजोमंडल, प्रकाश-चक्र

Thursday, May 19, 2011

"महा"-नगर

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सामने विस्तार ही विस्तार है

दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
पता नहीं!

पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है...
पहाड़, जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बमुश्किल ही बताया जा सकता है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें सदियों से उल्टा लटका रखा है |

पर आसमान है |
और दूर तक है
इतनी दूर तक कि उसका दूसरा सिरा कहाँ है
मुझे नहीं दीखता...
शायद अनंत में होगा ...मुझे क्या ?

बारवीं मंजिल पर बैठ
शीशे कि दीवारों से
हर रोज़ देखती हूँ ये विस्तार
और हर रोज़ ही महसूसती हूँ
अपने भीतर कुछ घुटता हुआ ...

"महा"-नगर शायद
इसे ही कहते हैं !

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Tuesday, April 12, 2011

जड़ें

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बहुत फैलीं हैं 
तेरी यादों कि  जड़ें


बरसात चाहे ज़हन के
जिस भी हिस्से में हो
पर जो ग़म हरा हुआ है 
तेरे नाम का ही रहा है 

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Tuesday, March 15, 2011

उदास दोपहरें



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छोटी थी,
तो अक्सर देखा करती थीमाँ को

उस उपर वाली दुछत्ती पे धरे
संदूक को उतार
उस की एक एक चीज़
फिर से खोल-तह, झाड पोंछ, सईहारते !
यह उसकी दैनिक नहीं
तो कम से कम
साप्ताहिक दिनचर्या का अंग तो था ही

यूँ तो उस संदूक में धरी
कोई भी चीज़
इंच भर भी
इधर से उधर नहीं हुई होती
और होती भी कहाँ से
दुछत्ती इतनी ऊंची थी
कि उस तक पहुँचने के लिए
माँ को भी
सबसे ऊंची वाली मेज के ऊपर
कुर्सी रख कर चढ़ना पड़ता...
...और फिर सबको पता था
कि उस संदूक में
नेपथलीन की गंध में तह किये
पुराने कपड़ों के सिवाय
और कुछ है भी नहीं.... |

पर फिर भी माँ उसे
अक्सर ही उतारती
और अपनी सारी दोपहर
उसके साथ ही बिता देती...

हाँ, माँ इस काम के किये खासतौर पर
दोपहरें ही चुना करती ...
...वो उदास दोपहरें |
अब यह कहना थोडा मुश्किल है
कि माँ उदास दोपहरें चुना करती थी...
या माँ को उदास देखकर
दोपहरें खुद ही उदास हो जाया करतीं...
पर हाँ, वो दोपहरें उदास होतीं ...

सच....उस वक़्त दूसरों की तरह
मुझे भी यही लगता था
कि माँ को काम करने की आदत है
और इसीलिए वो काम ना होने पर भी
काम ढूंढ लिया करती है
पर अब
जब खुद उस पड़ाव पर आ पहुंची हूँ
जहाँ ना तो नाखूनों पर चावल दे जाने वाले बगूलों ( माना जाता था कि इससे ख्वाहिशें पूरी होती हैं)
की अहमियत रह गयी है
ना ही जिद्द करने की उम्र
और जहाँ ख्वाहिशें अक्सर भविष्य के नाम लिखे
वर्तमान के किसी संदूक के हवाले कर दी जाती हैं,
बड़े एहतियात से... तब जा कर समझ आया है
कि उन् उदास दोपहरों की उदासी
आती कहाँ से थी....

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Tuesday, November 30, 2010

एक पुराना सवाल ... एक पुराना ख़याल...

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कैसे खड़ी हो जाती हैं
वहाँ दीवारें
मजहबों की
जहाँ दबी होती हैं
आहें, आंसू, सिसकियाँ  

कमज़ोर नहीं पड़ती
सीली ज़मीं पे रखी नीवें....?
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Sunday, July 18, 2010

रिश्वतखोर खला की परतें ...

जानती हूँ
कुसूर तेरा नहीं खुदाया
जो दुआओं में मेरी
असर ना हुआ

ये खला की सात परतें
जो दरम्यान खड़ी है ना,
...रिश्वतखोर बहुत हैं !

खा जाती होंगी
तुझ तक पहुँचने से पहले ही 
थोड़े अलफ़ाज़, थोड़ी शिकायतें,
और ढेर सारी मिन्नतें
जो रोज़ भेजती हूँ तुझे
धूप, अर्घ्य और नवैध के साथ...

ठीक वैसे ही
जैसे कुतर जाती हैं किनारे
हर रोज़ आसमान में टंगे
उस गोल चाँद के
जब वह
सब सय्यारों को टापता हुआ
मेरी खिड़की से कूद
मेरी कोठरी के फर्श पर उतरता है....

बेचारा ! चौकोर ही बचा होता है तब....|

रिश्वतखोर बहुत हैं ये खला की सात परतें ...!