Sunday, May 31, 2009

छुट्टी के दिन


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सच माँ,
छुट्टी के दिन तुम्हारी
बहुत याद आती है

दिल करता है
दौड़ के तुम्हारे पास
पहुँच जाऊं
और एक सांस में
गा सुनाऊँ
हर वो छोटी से छोटी बात
जो घटी
पिछली मुलाक़ात से
अब तक के दौरान
ठीक वैसे ही
जैसे
बचपन में
स्कूल की छुट्टी की घंटी
कानों में पहुँचते ही
किया करती थी

पर क्या करुँ माँ,
बड़े सपनों का मूल्य भी तो
बड़ा होता है!
शायद 722 मील जितना बड़ा........

हमने भी तो एक बड़ा सपना देखने की
भूल कर डाली
हाँ हमने,
आखिर
तुम्हारे सपनों में मेरा साथ
रहा हो या न रहा हो,
पर मेरे सपनों में
तुम्हारी साझेदारी
हमेशा रही है

सो,
देखो ना
मूल्य भी अब हम
साझा ही चूका रहे हैं
बड़े सपनों द्बारा
छोटी छोटी खुशियों के
निगले जाने का
और छोटी छोटी छुट्टियों को
बड़ी छुट्टियों के
इंतज़ार में बिताने का ...........

सच माँ,
छुट्टी के दिन तुम्हारी
बहुत याद आती है........
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Sunday, May 24, 2009

कोई कविता मुझसे फूटती क्यूँ नहीं


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जाने क्या हुआ है मुझे
कि अब कोई कविता मुझसे
फूटती ही नहीं!

संवेदनाएं ख़त्म हो चली हैं
ऐसा भी नहीं
विचारों की पोटली में
अब भी जाने कितने ही विचार हैं
जो गुमनामी के अंधेरों को पीछे छोड़
जग जाहिर होने को
उछल रहे हैं ….

पर हाँ, कविता में बंधना
अब उन्हें स्वीकार्य नहीं

शायद वे डरते हैं.
हाँ! वे डरते ही हैं….
पर बंधनों से नहीं!

‘पारस्परिक स्वीकृति से बुने गए बंधन
उन्मुक्तता देते हैं, संकुचन नहीं’
इतनी समझ तो उन्हें भी है

सो यह डर बंधनों का नहीं
बल्कि उस वक़्त का है
जिसका अंजाम वे अभी
मेरे ‘मौन’ के रूप में
देख रहे हैं

वह वक़्त,
जब ‘वक़्त’ एकबार फिर अपनी
कुटिल चाल बदलकर
उन्हें बंधन-मुक्त कर देगा
और छीन लेगा
वह उन्मुक्तता
जिसकी तब तक उन्हें
‘आदत’ पड़ गयी होगी

और हाँ!
वक़्त के इस निर्णय में
किसी पारस्परिक तो क्या
आंशिक स्वीकृति की भी
गुंजाईश ना होगी

आखिर वक़्त को तो
बाद्शाहियत की आदत है
‘राय-मशवरे, स्वीकृति-अस्वीकृति’
यह सब तो उसे
‘वक़्त-बर्बादी’ के नुमाइंदे
नज़र आते हैं

सो,
ऐसे में
अब तुम ही कहो
अंजाम जानकार भी
भूल दोहराने का गुनाह
कोई क्यूँ करे….?
और उसके ऐसा ना करने पर
मैं उससे शिकायत भी करूं
तो कैसे………..?????

इसलिए कहती हूँ
के ‘गर जवाब हो….
तो ही मुझसे दुबारा पूछना
कि “क्या हुआ है मुझे?
अब कोई कविता मुझसे
फूटती क्यूँ नहीं?”

अन्यथा छोड़ देना
मुझे मेरे
मेरे ही हाल पर
मेरे मौन के साथ…..
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Friday, May 08, 2009

एक टुकडा दिल्ली: D Confessions of Delhi, a city that has stood innumerable changes and has still been the same


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चुन्नी देवी को मुझसे बहुत शिकायत रहती है...आये दिन मुझे सुना सुना कर अपनी पडोसन से कहती है कि कितना बदल गया हूँ मैं. कहती है की जब वह दुल्हन बन कर आई थी अपने मुनिरका वाले इस मकान में, उस वक़्त सड़कों पर मोटर गाड़ियों के हार्न नहीं बल्कि इक्के की टप-टप सुनाई पड़ती थी. घूमने के लिए "मॉल" नहीं बल्कि 'लाल किला' और 'India Gate' जाया करती थी. सब्जियां खरीदने उसे बाज़ार तक नहीं जाने की ज़रुरत नहीं पड़ती थी, बल्कि "सब्जी लेलो, ताज़ी ताज़ी सब्जी!" की आवाज़ लगाती झुमकी सुबह सवेरे ही घर आ जाती और सब्जी के साथ साथ बिन पैसे की थोडी धनिया-मिर्च रखते रखते पड़ोसियों के घर के हाल चाल भी सुना जाती.... और तो और अपने पति को 'गरमा-गर्म' खाना पहुचने वो एक हाथ का घूंघट काढे खुद ही जाया करती....साइकिल पर...खेतों की पगडंडियों से होते हुए कनाट प्लेस तक.... और फिर इसी बहाने, पति का थोडा और सान्निध्य उसे मिल जाया करता.... उस वक़्त को याद करता हूँ तो हंसी आ ही जाती है और चुन्नी देवी की मेरे बदलने को लेकर मुझसे शिकायत मुझे लाज़मी ही लगती है... आखिर अब यदि वो चाहे भी, तब भी साइकिल पर सवार हो, दिल्ली भ्रमण पर थोड़े ही निकल सकती है.... आखिर सनसनाती गाडियां जब बगल से गुजरेंगी तब उसके आधे हाथ का घूंघट उड़ ना जायेगा....और फिर वो घूंघट संभालेगी की खुद को....



आह! वो वक़्त तो मुझे भी बहुत प्यारा था, और उसकी स्मृतियाँ आज भी मेरे दिल के बहुत करीब हैं ...पर क्या करुँ बदलना पडा मुझे....बदलना पडा क्यूंकि वक़्त रहा था.... बदलना पडा क्यूंकि वक़्त के साथ साथ तुम्हारी ज़रूरतें बदल रही थीं.....बदलना पडा क्यूंकि यदि मैं तुम्हारी ज़रूरतों के अनुरूप अपनी संभावनाओं को ना बदलता तो ताकियानूसी और 'आउट-डेटेड' कहलाता ....


ज़िन्दगी ने अपनी रफ़्तार बढा ली थी, सो मैंने भी अपनी सड़कों पर साइकिल और रिक्शों के साथ साथ गाड़ियों के लिए भी जगह बना दी... नए लोग हर दिन् मुझसे जुड़ रहे थे सो उन्हें जगह देने को मैंने अपने वन साम्राज्य और पहाडों को थोडा समेट लिया.... हर किसी को कम से कम उसके हिस्से की छत तो दे सकूं इसीलिए उनके हिस्से के आसमान में थोडी कटौती कर भू-तलीय मकानों को बहु-तलीय इमारतों में बदल दिया मैंने... लोगों के पास खरीदारी करने का समय घटने लगा था सो मैंने बाजारों के साथ साथ मॉल्स को भी थोडी जगह दे दी ताकि ज़रूरतों के सामान जुटाने को उन्हें भटकना ना पड़े... हर दिन जुड़ते नए लोगों की वजह से बसों में भीड़ और सड़कों पर जाम बढ़ने लगे थे, सो मैंने मेट्रो भी जोड़ ली अपनी यातायात सुविधाओं में.... विदेशों से भी मुझे जानने समझने लोग आने लगे थे, आखिर देश की राजधानी हूँ मैं, सो उन्हें यहाँ आकर असुविधा ना हो सो मैंने उनके स्तर की सुविधाएं भी जुटा लीं . उन्हें यहाँ आकर अजनबियत ना लगे सो मैंने उनके जाने पहचाने कुछ नामों जैसे LEVIS, NIKE, KFC, LEE....... इत्यादि को भी अपनी पृष्ठभूमि के संग जोड़ लिया।



और इस तरह लोगों की ज़रूरतों क पूरा करते करते मैं बदल गया.....



पर हाँ मुझे अपने इस बदलाव पर खेद नहीं, बल्कि हर्ष है... आखिर यह मेरे ही बदलाव का ही तो नतीजा है आज आज वो ही चुन्नी देवी जो कल तक आधे हाथ का घूंघट काढे बिना कहीं निकलती ना थी, आज अपनी पोती की स्कूटी पर बैठ Mc'donals में burger खाने जाती है... अब तुम ही कहो यदि मैं ना बदलता तो क्या वो बदलती?



एक तरफ जहाँ मेरा यह बदलाव मुझे ख़ुशी देता है वहीँ दूसरी ओर मुझे सवालों के कटघरे में भी लाकर खडा कर देता है... सवाल मेरी पहचान , मेरी संस्कृति पर... कुछ लोगों को लगता है की मेरी अपनी कोई संस्कृति , अपनी कोई पहचान नहीं. और इसका कारण अक्सर यही बताया जाता है की क्यूंकि मैं हर बदलता गया हर किसी की ज़रूरतों के अनुसार, ... वे कहते हैं कि मैंने अपने साथ जुड़ते नए लोगों को अपने रंग में नहीं ढाला बल्कि मैं खुद उनके रंग में रंग गया... सो मेरे अपने रंग अब शेष नहीं.... पर मुझे ऐसी बातें कहने वालों पर ही हंसी आती है.... मैं कहता हूँ कि हर किसी के रंग में ढलना ही मेरी प्रकृति और संस्कृति है.... रंग जब तक मिलें ही ना तब तक तस्वीर पूरी कहाँ होती है .... और रंगों का अस्तित्व ही तब है जब वे एक सुंदर तस्वीर में ढल जाएँ.... और जहां तक अपने रंगों को , अपनी संस्कृति को संजो कर रखने का सवाल है तो मुझे ऐसा करने के लिए उसे संभालकर किसी म्यूज़ियम में रखवाने की ज़रुरत नहीं.... क्यूंकि मेरी संस्कृति एक सांस लेती संस्कृति है ... हर दिन बढती, फलती फूलती संस्कृति है.... हर पल धड़कती संस्कृति है... और ये हर उस इंसान में संरक्षित है जो किसी भी तरह मुझसे जुडा हो, फिर चाहे वो जुडाव कितना ही छोटे अंतराल के लिए ही क्यूँ ना हो...



Mrs Iyyer जितने ख़ुशी से पोंगल और ओणम मनाती हैं, उतनी ही ख़ुशी से दीपावली और दुर्गा पूजा भी.... जेनरेशन Y की रीता भले ही kfc के कबाबों की शौकीन हो, पर चांदनी चौक की गलियों के पराँठे और नत्थू की चाट खाने भी हर वीकएंड को पहुँच ही जाती है... और तो और वो विदेशी लोग जो कुछ दिनों के लिए ही मुझे देखने , या समझने आते हैं वे भी शौखिया तौर पर ही सही,पर अक्सर भारतीय परिधानों में घूमते नज़र आते हैं...



मानता हूँ की मेरे पास अपना कहने के लिए कोई भाषा नहीं...., कोई वेशभूषा मेरी अपनी नहीं... मेरा अपना कोई त्यौहार, कोई नृत्य नहीं पर फिर भी ऐसा कुछ नहीं जो मेरा ना हो... हिंदी से लेकर पंजाबी तक, oriya से लेकर मलयालम तक, असमिया से लेकर भोजपुरी तक हर भाषा बोलने वाले लोग मुझमें बसते हैं, भारत के हर प्रांत की वेशभूषाएं , उनके त्यौहार, उनके व्यंजन , उनके नृत्य , सबको मैंने संजोया ही नहीं है बल्कि ज़िंदा भी रखा है मैंने खुद में... यदि मैं कहूं की मुझमें एक छोटा भारत बस्ता है और मेरे हर घर में एक शहर तो वो अतिशयोक्ति ना होगी....... भारत का दिल धड़कता है मुझमें... और मेरा दिल मुझसे जुड़े हर इंसान में....



मैं शायद आकाश में उड़ते हुए उस परिंदे की तरह हूँ जो उड़ता है ऊंचा, बहतु ऊंचा, और सिर्फ इसीलिए ही उड़ पाता है क्यूंकि वो आकाश को अपना मानता है.... किसी और पंछी द्वारा आकाश पर अपने हक के छीने जाने के डर से वह अपने पंखों का विस्तार करना नहीं छोड़ता.....



मैं भी कुछ ऐसा ही हूँ.... अपने रंगों के अस्तित्व खो देने के डर से मैं दुसरे रंगों को खुद से अलग रखने कि कोशिश नहीं करता... मैं ढलता हूँ हर रंग में ताकि तस्वीर पूरी हो सके, बदलता हूँ हर पल में ताकि फीके-धुन्धलाये रंगों पर नयी चमक आ सके, बस्ता हूँ हर घर में ताकि कभी बेआसरा ना हो सकूं और धड़कता हूँ हर दिल में.... ताकि ज़िंदा रह सकूं तब तक, जब तक ये जहां है....



मैं दिल्ली हूँ..... दिलों का शहर.......... दिल की बातों का शहर.... दिल के रंगों का शहर.... धडकनों काशहर... मुझमें भारत का दिल बसता है और हर दिल में एक भारत :)

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Tuesday, April 28, 2009

सामाजिक ढकोसले और नारी

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तुम्हारा यह समाज
ढकोसलों की नींव पर ही
टिका हुआ है…
आखिर उसका स्वरुप
तुम्हारे अनुरूप हो,
इसके लिए ऐसा होना
आवश्यक जो है!

नारी को देवी की संज्ञा दे दो,
उसे पूजनीय बना दो,
ताकि वह मूर्तिमान हो,
बस देती रहे, पर रहे सदा
तटस्थ

उसे गृहलक्ष्मी, गृह-स्वामिनी बना दो
ताकि वह
घर की चार दीवारी से बाहर के
तुम्हारे साम्राज्य की, आकांक्षा तो दूर,
कल्पना तक ना कर सके

इतने झुका दो उसके कंधे
परिवार की इज्ज़त
और कुल-मर्यादा
का हवाला दे देकर
के वह अपने अस्तित्व के शव तक को
स्वाव्लंभी हो, बिना किसी पुरुष नाम के,
कन्धा तक ना दे सके

और यदि किसी रोज़
तुम्हें दिखने लगे,
कि देवी बनकर जीना उसे स्वीकार्य नहीं,
तो उसे सती करा दो,
धर्म का रूमाल तो जेब में लिए
फिरते ही हो

गर दिखे कि वह
मात्र गृह-लक्ष्मी, गृह-स्वामिनी बनकर खुश नहीं,
तो उसे ‘बाजारू’ बना दो
आखिर तुम्हें तो बस जुबां ही हिलानी है
हवाएं तो रहती ही हैं,
तैयार......... तुम्हारी खि़दमत मे !

और यदि नज़र में आ जाए
कि वह
परिवार की इज्ज़त
और कुल मर्यादा के लिए
‘पूर्वारक्षित’ कन्धा
अपनी आकन्क्षाओं के साथ
बाँट रही है
तो उसे चरित्रहीन बता
उसकी ही इज्ज़त की धज्जियाँ उड़ा दो….
वैसे भी भीगा दामन तार तार होने में
वक़्त ही कितना लगता है

और यदि इस सब के बावजूद
तुम्हें ‘अपने’ तथा
‘अपनी परिकल्पना के समाज’
के अस्तित्व पर मंडराता संकट
टलता ना दिखे
तो फिर ‘नैतिकता’ और
‘संस्कृति’ का नगाडा पीट पीट कर,
जोर जोर से चिल्लाओ
और जुटाओ अपने समर्थक
जो सुझा सकें तुम्हें….
कुछ नए ढकौंसले !

क्यूंकि….
तुम्हारा यह समाज
ढकोसलों की नींव पर ही,
टिका हुआ है

और इसका स्वरुप
तुम्हारे अनुरूप ही बना रहे
इसके लिए ऐसा होना,
आवश्यक भी है !

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Monday, April 20, 2009

A beautiful poem by PABLO NERUDA

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I want you to know
one thing.

You know how this is:
if I look
at the crystal moon, at the red branch
of the slow autumn at my window,
if I touch
near the fire
the impalpable ash
or the wrinkled body of the log,
everything carries me to you,
as if everything that exists,
aromas, light, metals,
were little boats
that sail
toward those isles of yours that wait for me.

Well, now,
if little by little you stop loving me
I shall stop loving you little by little.

If suddenly
you forget me
do not look for me,
for I shall already have forgotten you.

If you think it long and mad,
the wind of banners
that passes through my life,
and you decide
to leave me at the shore
of the heart where I have roots,
remember
that on that day,
at that hour,
I shall lift my arms
and my roots will set off
to seek another land.

But
if each day,
each hour,
you feel that you are destined for me
with implacable sweetness,
if each day a flower
climbs up to your lips to seek me,
ah my love, ah my own,
in me all that fire is repeated,
in me nothing is extinguished or forgotten,
my love feeds on your love, beloved,
and as long as you live it will be in your arms
without leaving mine.


PABLO NERUDA
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Saturday, April 18, 2009

फासले


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ये शहर मुझे बस दौड़ता हुआ दिखता है,
पर दूरियां हैं, के घटती नहीं दिखती

अपनी धूरी पर घूमने से, फासले तय हुए हैं भला?
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Thursday, April 16, 2009

प्रेम धूप


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मान क्यूँ नहीं लेते
के प्रेम है तुम्हें मुझसे

क्यूँ बंद किये बैठे हो
सारे दरवाज़े खिड़कियाँ
अपने मन की?
इसी डर से ना
के कहीं कोई जज़्बात तुम्हें
दगा ना दे दे!

क्यूँ आँखों में कृत्रिम
क्रोध लिए फिरते हो?
इसी भय से ना
के यदि
यह आवरण हटा
तो नेह
छलक ही जायेगा!

क्यूँ गिरहें लगाये बैठे हो,
यूँ खुद में?
इसीलिए ना
के यदि ये खुल गयीं
तो तुम्हारी भावनाएँ
तुम्हें बहा
ले ही आयेंगी,
मुझतक!

क्यूँ मुंह मोड़
चले जा रहे हो
दूर मुझसे?
इसीलिए ना
के कहीं नज़र में
'मैं' आ गयी
तो तुम्हारे ये सारे प्रारब्ध
खुद बखुद ही
'अर्थहीन' हो जायेंगे

पर ये क्यूँ नहीं समझते
के इन् सारे प्रारब्धों का अर्थ
'अथाह पीडा' से अधिक,
तो अब भी कुछ नहीं

आखिर
प्रेम तो धूप है
बुझाने जाओगे
तो पाँव ही जलेंगे
धूप तो अपना रस्ता
फिर ढूँढ लेगी

सो...
मान क्यूँ नहीं लेते कि .....
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Saturday, March 21, 2009

चुम्बकत्व

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जब तुम मुझसे रूठ,
दूर दूर रहने की कोशिशें करते
और मैं,
मैं तुम्हें न मनाते हुए भी
तुम्हारे ही पास रहने के
उपक्रम

ऐसे में ,
कुछ अंतराल बाद ही सही,
पर आत्मिक प्रेम के लिए
क्रोध स्वतः ही स्थान छोड़ देता ….
और तुम लौट आते,
एक बार फिर, मेरी ही बाहों में…

तुम्हें यूं पुनः अपने पास पाकर,
मैं पूछ बैठती
“कभी तुम सचमें मुझसे दूर तो न चले जाओगे?”
और मेरे इस भय को
हंसी में उडाने की चेष्टा करते तुम कहते,
“पागल हो!
मेरी ऐसी किस्मत कहाँ!
कितनी ही कोशिशें कर तो चुका हूँ,
पर नाकामयाबी के सिवाय आज तक
कुछ और हाथ लगा है भला ?
तुम्हारा चुम्बकत्व मुझे खींच ही लाता है
हर बार,
वापस तुम्हारी ही कैद में… ”

तुम्हारा यह जवाब सुन,
मैं कहती कुछ नहीं,
बस मुस्करा देती…
के समझती थी कि
“तुम्हारा चुम्बकत्व”
तुम्हारी शब्दावली से अकस्मात बरसा यह शब्द
मेरे आशंकित मन को
अपने प्रेम कि शक्ति के प्रति
आश्वस्त करने के लिए था

पर ये तो मैं समझती थी ना…
मेरा पागल मन थोड़े ही!
वह नासमझ तो तुम्हारे “पागल हो!” वाक्यांश को
स्थापित करने में लगा था
‘आशंकित से आतंकित होते हुए’

इस ख़याल मात्र से
कि आखिर
‘चुम्बकत्व की सीमा तो
निश्चित होती है’
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Sunday, March 15, 2009

औपचारिकता

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अब भी
जब हम कहीं टकरा जाते हैं
तुम पूछ ही लिया करते हो
“कैसे हो”
मैं भी
झट कह देती हूँ
“अच्छी”

जानती हूँ
के जब तुम्हें ये जानना होगा
तब तुम्हें
मुझसे पूछने की
आवश्यकता ना होगी

पर अच्छा है,
औपचारिकता की ये दीवार
बनी ही रहे!!
हकीकत देख कर तुम
मुंह घुमा लो
तो पीडा अधिक होगी

दुर्घटनाओं के बाद का दृश्य
अक्सर
भयावय ही होता है …
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Wednesday, March 04, 2009

वक़्त बोलता है!

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मैं जब रूठ तुमसे
गुस्से में कह देती,
“तुम कभी याद न आओगे मुझे”

तुम भी जवाब कुछ यूं परोसा करते
“देखेंगे, वक़्त बोलेगा वो तो”

देखने के लिए अब तुम नहीं हो
सालों गुज़र गए तुम्हें गए
पर तुम्हारी दी हुई घडी की टिक-टिक
अब भी बंद नहीं होती

सच,
तुम्हारा दिया हुआ वक़्त
बोलता बहुत है… !!!
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