Sunday, July 18, 2010

रिश्वतखोर खला की परतें ...

जानती हूँ
कुसूर तेरा नहीं खुदाया
जो दुआओं में मेरी
असर ना हुआ

ये खला की सात परतें
जो दरम्यान खड़ी है ना,
...रिश्वतखोर बहुत हैं !

खा जाती होंगी
तुझ तक पहुँचने से पहले ही 
थोड़े अलफ़ाज़, थोड़ी शिकायतें,
और ढेर सारी मिन्नतें
जो रोज़ भेजती हूँ तुझे
धूप, अर्घ्य और नवैध के साथ...

ठीक वैसे ही
जैसे कुतर जाती हैं किनारे
हर रोज़ आसमान में टंगे
उस गोल चाँद के
जब वह
सब सय्यारों को टापता हुआ
मेरी खिड़की से कूद
मेरी कोठरी के फर्श पर उतरता है....

बेचारा ! चौकोर ही बचा होता है तब....|

रिश्वतखोर बहुत हैं ये खला की सात परतें ...!

Friday, June 04, 2010

अधूरा सा कुछ ............पुराना सा कुछ .............उम्र सा कुछ.... अम्ल सा कुछ ......... खामोशी सा कुछ.......लफ्ज़ सा कुछ ........ मुझ सा कुछ .........और शायद .......तुम सा कुछ ............

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कहीं पढ़ा था
"लफ्जों के दांत नहीं होते,
पर काटते हैं,
और काट लें
तो फिर उनके ज़ख्म
उम्र भर नहीं भरते!"

पर तुम्हारी खामोशी...
वो तो काटती भी नहीं,
बस घुल जाती है,
रूह में,
और घुलते घुलते
घो़लती रहती है धीरे धीरे,
मुझे भी, अपने भीतर,
किसी अम्ल के मानिंद!
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Saturday, April 10, 2010

इल्ज़ाम

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मेरी कविताओं की दुनिया
तुम्हारे इर्द गिर्द फैली हुई थी….
हर शब्द, हर भाव
तुम्हारे ही चारो ओर घूमता था
तुम्हारे ही गुरुत्वाकर्षण से
उन्हें निश्चितता मिलती थी,
धुरी की ….


पर जबसे तुम छोड़ गए हो उन्हें
यह यहाँ बेतरतीब से बिखरे पड़े हैं........
गुरुत्व को लम्बी दूरियां तय करना
कब आया है !


यूँ तो तुम्हारी ही तरह
मैंने भी अपनी अलग दुनिया बसा ली है…
एक ऐसी दुनिया
जहां शब्दों की ज़रुरत ही नहीं.
संवाद एहसासों की शक्लों के ज़रिये होता है
नज्में जहाँ कलम से नहीं
ज़िन्दगी से फूटा करती हैं
पढ़ी सुनी लिखी नहीं,
जी जाती हैं
सच यह हसीं सी दुनिया
अपने आप में संपूर्ण है …
पर फिर भी मुझे
उन् शब्दों की बेतरतीबी खलती है
हाँ दुनिया नहीं, शब्द नहीं,
तुम भी नहीं,
बस उन् शब्दों की बेतरतीबी !
के अब जब वे नज्मों में
बहा नहीं करते,
तो बस टकराया करते हैं
एक दूसरे से,
लड़ा करते हैं
कभी आपस में, कभी खुद से ही ………….
चिल्लाया करते हैं,
बेवजह….
(शायद तुम्हें ही पुकारते हों,
बेवजह तो तब भी होगा)


नहीं जानती
यह शोर तुम्हारी दुनिया तक
पहुंचता है या नहीं
पर मेरी दुनिया तक आ ही जाता है
और मैं चाह कर भी
इसे अनसुना नहीं कर पाती
सिर्फ इसलिए ….इसीलिए ही लौटती हूँ
वापस उस बेतरतीब दुनिया में
दौड़ती हूँ हर एक शब्द के पीछे
जिनकी रफ़्तार
मेरे ख्यालों के रफ़्तार से भी तेज़ है
और आखिरकार
जब बहुत मेहनत के बाद
वह शब्द हाथ आ जाता है
तो तुरंत पिन कर देती हूँ उसे वहीं
तुम्हारी  ही किसी याद के सहारे |
उतना वेग और किसी तरह तो
संभाला जा नहीं सकता…………


यह सिलसिला जारी रहता है
मुसलसल कई दिनों तक
मेरी सांसें टूटने लगती हैं
और जब काफी सारे शब्द
तरतीब पा जाते हैं
तो लोग समझ बैठते हैं
मैंने तुम्हें याद कर
फिर एक नज़्म कह डाली….


उफ़... यह इल्ज़ाम कितना बड़ा है!
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Saturday, March 06, 2010

खामोशी:: यहाँ पसरी खामोशी को तोड़ने का एक प्रयास मात्र

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बरसों से ख़ामोशी खानाबदोश हुआ करती थी |

मेरी कठोर हंसी उसे घर बनाने ही कहाँ देती...!

जब भी उतरती फिज़ा में,

एक छनाके के साथ उतरती

और एक ही झटके में

चकनाचूर कर डालती,

चुप्पी की

आखिरी ईंट तक!


पर देखो,

अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है

यह हमारे दरमयां........

यकीं जो है इसे भी ,

के अब जो तुम चले गए हो

कभी ना लौटने की खातिर

तो रुख न करेगी इधर का

यह कमबख्त हंसी भी

दुबारा कभी


ख़ामोशी को है घर मिल गया

और मेरी हंसी

खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब........!

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Sunday, December 13, 2009

मेरा घर

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बहुत दिन हुए
ठीक से सोयी नहीं |
कोई नज़्म जो नहीं लिखी तूने...

घर के सिवा सुकूं
कहाँ मिले है?
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तेरी यादें

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जब भी चाहा
तेरी यादों को दफन करना
तुझ संग बीता
हर लम्हा मुझे
साँस लेता हुआ मिला

अब तुम ही कहो
ज़िन्दगी का गला कैसे घोंटूं ?
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Wednesday, November 11, 2009

छल्ले

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रूह अब भी
अटकी हुई सी जान पड़ती है…
वहीं, उसी मोड़ पर, जहां
तुमने पहनाये थे
बाहों के छल्ले गले में
और घबराहट में मैंने
अपने दाहिने पाँव के अंगूठे को
आधे छल्ले सा मोड़
रख दिया था तेरे
बायें पाँव पर…।

नाखून चुभ गया था
तुझे मेरा ….
और दर्द से छटपटा
चिल्लाया था तू
“आह ”……॥

“ओह्ह !!!” कहकर खेद जताने को
होठों के छल्ले जोड़े ही थे मैंने,
की तूने झट अपने लब रख उनपर,
वो जगह भी भर दी थी….

गिरहें खोल मेरी, सुलझा रहा था
मुझको आहिस्ता आहिस्ता तू,
और साँसों के कुछ आवारा छल्ले
उलझ रहे थे आपस में …

वक़्त भी वहीँ कहीं उलझ गया होगा …
तभी तो देखो
वह मोड़ तो कबका गुज़र गया ….
तुमने अपना रस्ता भी बदल लिया,
और अब तो सुना है
अनामिका के छल्ले भी….
पर मेरी रूह....... वह तो अब भी वहीँ
अटकी हुई सी जान पड़ती है…

छुड़ा तो लूं, पर जाऊं कैसे..??
वह मोड़ तो एक स्वप्न में था …
और तुम बिन तो कोई स्वप्न भी मुझे
अपनी दहलीज तक लाँघने नहीं देता …..

सोचती हूँ तुम्हें आवाज़ दूं .....
यूँ टुकडों में अब और जिया नहीं जाता.....
पर फिर रहने देती हूँ.....
जानती हूँ, तुम अब नहीं लौटोगे..…
लौट भी नहीं सकते.....

पर सुनो... इतना तो कर ही सकते हो........

मुझे रिहाह करने की खातिर,
अपनी एक नज़्म ही भेज दो ना,
पिरोकर एक छल्ले के मानिंद………।

मैं उसे ही पहन गले में,
उसका एक सिरा
खींच लूंगी, अपने ही हाथों …।
साँसे ठहर जायेंगी,
और वक़्त,
फिर एक बार
चल पडेगा .....

मेरी रूह आज़ाद हो जायेगी…...........
हमेशा हमेशा के लिए !

सुनो,
इतना तो कर ही सकते हो ना.... ??

Friday, November 06, 2009

तमन्नाओं के पर


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जब तक तुम थे
मैंने अपनी तमन्नाओं के
पर नहीं बढाए................
के रंगों कि कमी
कभी महसूस ही ना हुई !

पर अब लगता है
के बढाऊँ इन्हें....
और इतना बढाऊँ
के इनके रंगों से
सारा आकाश ढाँप दूँ !!

क्या करुँ ....
दिल को ना सही,
पर कम से कम,
ज़िन्दगी को तो यह गुमां रहे
कि तुम अब भी
उसके साथ हो............................

Thursday, October 29, 2009

आँसू


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कितनी दफा मना किया था
पर सुनता कब था?
ज़रा नज़र हटी नहीं,
के दौड़ पड़ता , झरोखे की ओर.

पाँव उन्चका उन्चका के झांकता,
हाथ बढ़ा बढ़ा के पुकारता.
आह! आखिर वाही हुआ ना,
जिसका डर था!

लोग बताते हैं
पलकों के तिरपाल पकड़,
बहुत देर तक लटका रहा था…
शायद कुछ देर और
इंतज़ार कर लेना चाहता था तुम्हारा.

पर वो सीली पलकें…
आखिर कब तक सहारा देतीं?
सो चटख गयी कोई बेचारी,
और फिसल पड़ा वह भी.

सीधे औंधे मुंह गिरा था,
गर्म पथरीली सड़क पर
और गिरते ही,
धुआं हो गया.

आह! आज फिर मैंने
तुम्हारी इक निशानी गँवा दी!!!


२३ नवम्बर,08

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Friday, October 16, 2009

सुराख़

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मेरी छत की दीवार पर
दो सुराख़ हैं.
जाने कितनी दफा
भर चुकी हूँ इन्हें,
पर हर बरस,
बरसात में,
उघड ही जाते हैं

और इनसे रीसता पानी
वक़्त-बेवक्त टपक
रुसवा कर जाता है,
सरेआम!

शुक्र है, ये बरसात
बारहों- मास् नहीं रहती!

पर इन दो सुराखों का क्या करुँ?
कैसे भरूँ इन्हें,
के तेरे दर्द की
नुमाइश ना हो?

इस ओर तो
मौसम भी नहीं बदलता!

और बदले भी कहाँ से?
मेरा तो आफताब भी
तू ही था.
तेरे बाद अब
किसके लगाऊं फेरें,
के दिन फिरें…?

‘कुछ बदलेगा’
ये उम्मीद भी अब
बुझ चुकी.
बाकी है…तो बस,
यही दुआ
के ‘अब के बरस
ये बरसात
मेरी साँसे भी बुझां दे
और ये सुराख
हमेशा हमेशा के लिए
बंद हो जाएँ….!!’

एक पुरानी रचना.... 11 Dec, 08