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रूह अब भी
अटकी हुई सी जान पड़ती है…
वहीं, उसी मोड़ पर, जहां
तुमने पहनाये थे
बाहों के छल्ले गले में
और घबराहट में मैंने
अपने दाहिने पाँव के अंगूठे को
आधे छल्ले सा मोड़
रख दिया था तेरे
बायें पाँव पर…।
नाखून चुभ गया था
तुझे मेरा ….
और दर्द से छटपटा
चिल्लाया था तू
“आह ”……॥
“ओह्ह !!!” कहकर खेद जताने को
होठों के छल्ले जोड़े ही थे मैंने,
की तूने झट अपने लब रख उनपर,
वो जगह भी भर दी थी….
गिरहें खोल मेरी, सुलझा रहा था
मुझको आहिस्ता आहिस्ता तू,
और साँसों के कुछ आवारा छल्ले
उलझ रहे थे आपस में …
वक़्त भी वहीँ कहीं उलझ गया होगा …
तभी तो देखो
वह मोड़ तो कबका गुज़र गया ….
तुमने अपना रस्ता भी बदल लिया,
और अब तो सुना है
अनामिका के छल्ले भी….
पर मेरी रूह....... वह तो अब भी वहीँ
अटकी हुई सी जान पड़ती है…
छुड़ा तो लूं, पर जाऊं कैसे..??
वह मोड़ तो एक स्वप्न में था …
और तुम बिन तो कोई स्वप्न भी मुझे
अपनी दहलीज तक लाँघने नहीं देता …..
सोचती हूँ तुम्हें आवाज़ दूं .....
यूँ टुकडों में अब और जिया नहीं जाता.....
पर फिर रहने देती हूँ.....
जानती हूँ, तुम अब नहीं लौटोगे..…
लौट भी नहीं सकते.....
पर सुनो... इतना तो कर ही सकते हो........
मुझे रिहाह करने की खातिर,
अपनी एक नज़्म ही भेज दो ना,
पिरोकर एक छल्ले के मानिंद………।
मैं उसे ही पहन गले में,
उसका एक सिरा
खींच लूंगी, अपने ही हाथों …।
साँसे ठहर जायेंगी,
और वक़्त,
फिर एक बार
चल पडेगा .....
मेरी रूह आज़ाद हो जायेगी…...........
हमेशा हमेशा के लिए !
-------------------------------------------------------- जब तक तुम थे मैंने अपनी तमन्नाओंके पर नहीं बढाए................ के रंगों कि कमी कभी महसूस ही ना हुई !
पर अब लगता है के बढाऊँ इन्हें.... और इतना बढाऊँ के इनके रंगों से सारा आकाश ढाँप दूँ !!
क्या करुँ .... दिल को ना सही, पर कम से कम, ज़िन्दगी को तो यह गुमां रहे कि तुम अब भी उसके साथ हो............................
मेरी छत की दीवार पर दो सुराख़ हैं. जाने कितनी दफा भर चुकी हूँ इन्हें, पर हर बरस, बरसात में, उघड ही जाते हैं
और इनसे रीसता पानी वक़्त-बेवक्त टपक रुसवा कर जाता है, सरेआम!
शुक्र है, ये बरसात बारहों- मास् नहीं रहती!
पर इन दो सुराखों का क्या करुँ? कैसे भरूँ इन्हें, के तेरे दर्द की नुमाइश ना हो?
इस ओर तो मौसम भी नहीं बदलता!
और बदले भी कहाँ से? मेरा तो आफताब भी तू ही था. तेरे बाद अब किसके लगाऊं फेरें, के दिन फिरें…?
‘कुछ बदलेगा’ ये उम्मीद भी अब बुझ चुकी. बाकी है…तो बस, यही दुआ के ‘अब के बरस ये बरसात मेरी साँसे भी बुझां दे और ये सुराख हमेशा हमेशा के लिए बंद हो जाएँ….!!’
लाइब्रेरी में किसी किताब में डूबे हुए, अचानक किसी के कुर्सी सरकाने की आवाज़ सुन, चौंककर देखती हूँ, पर वहाँ.. …. कोई नहीं होता
आफिस की सीढियां चढ़ते वक़्त अक्सर ठिठक जाती हूँ, किसी के सैंडल चटकाते हुए चढ़ने की आहट से … मुड कर देखना इस बार भी व्यर्थ ही सिद्ध होता है
सबसे शांत कोने में बने टी स्टाल पर चाय का इंतज़ार करते हुए भी लगता है के जैसे ठीक पीछे वाली टेबल से सुरसुराती चुस्कियों में घुली मिली कुछ चूडियों की खनक भी आ रहीं हों…| पीछे कोई, टेबल ही नहीं होती |
रक्षाबंधन पर, दूकान में लटकी हजारों राखियों में से सबसे सुंदर राखी ढूंढते वक़्त, दबी दबी सी कुछ हंसी ठिठोलियाँ ध्यान भग्न कर ही जाती हैं | खीज कर घूमती हूँ……. पर खुद को अकेला ही पाती हूँ |
कभी कभी पड़ोसियों के घर जाती हूँ तो भी गुमान होता है, की जैसे कोई पुकार रहा हो, किसी को – नाम लेकर, स्नेह भरी आवाज़ में | इस बार भी यह मेरा भ्रम ही होता है
लोग कहते हैं की मैं पागल हो गयी हूँ या जो थोडी मृदुता से अपना मत रखना चाहते हैं वे ‘चुकी हूँ’ की जगह ‘जाउंगी’ जोड़ देते हैं, अपनी आशावादिता का भी प्रमाण देते हुए |
हो सकता है तुम्हें भी यही लगे… जायज़ भी है… ‘अदृश्य’ को देखने-सुनने-महसूसने वाले लोग पागल ही तो होते हैं….
पर मैं जानती हूँ… जिन्हें मैं देखती-सुनती-महसूसती हूँ वे अदृश्य नहीं थीं…. बना दी गयी हैं वे सब वहीँ होती, जहां मैं उन्हें पाती हूँ… या शायद मेरी, तुम्हारी, हम सबकी… कल्पाना से भी आगे | बस यदि उनसे इस दुनिया में आने का हक छीना नहीं गया होता…!!!
------------------------------------- बस पौ फटने की देरी होती और, वह दौडी आती, आँगन की ओर.... मिची आँखें, नन्हें हाथों से मलते, नंगे ही पाँव.... बीनने वो रंगीन कांच के टुकड़े जो ना जाने कौन छोड़ जाता था हर रात वहां और बनता था कारण उसके अचरज का ...
माँ को उसका यूँ टुकड़े बीनना कभी भला ना लगा "किसी दिन चुभ जायेंगे, तब समझोगी..." वह फटकार लगा उसे भगा देती... पर माँ से नज़र बचाना उसे खूब आता था
उसके उठने से पहले ही एक एक छिटका रंग बीन चुकी होती वो.. और फिर उस छोटे से कमरे के ऊंचे से छज्जे पर छिप, बनाया करती... हर रोज़ एक नया kaleidoscope....
ज़िन्दगी में तो रंगों से उसका कोई सरोकार हुआ ही नहीं सो उनका आभाव भी नहीं खला ! पर हाँ, यह कांच की रंगीन दुनिया बहुत लुभाती थी उसे ज़रा घुमाया नहीं, की नजारे बदल गए... !!
"काश ज़िन्दगी भी ऐसी ही होती!" वह अक्सर सोचा करती और साथ ही सोचती "आज रात तो मैं नहीं ही सोऊँगी, और छिपकर देखूँगी की आखिर वह कौन जादूगर है जो रोज़ रोज़ यह रंगीन सौगाते छोड़ जाता है, मेरे लिए..!!"
पर नींद उसकी सोच कहाँ समझती थी! वह तो आ ही जाती... अपने समय पर |
पर आज, आज नींद ने ना सही, पर भगवान् ने उसकी सुन ली थी और सोते सोते वह खुद ही चौंक कर उठ गयी | बाहर आँगन से कुछ गिरने की आवाज़ जो आई थी |
"ज़रूर वह जादूगर छत से गिर पडा होगा!" सोचा उसने... और दौड़ पड़ी....आँगन की ओर.... मिची आँखें, नन्हें हाथों से मलते, नंगे ही पाँव....
सामने चांदनी बिखरी पड़ी थी और कांच के बहुत से टुकड़े भी... दूर एक कोने में माँ भी पड़ी थी... छिटकी..... सिमटी.... बिखरी सी.. बिलकुल कांच के टुकडों की ही तरह.... हरी .....नीली....बैंगनी सी......
और ठीक सामने खडा था ---- वह , लिए दाएं हाथ में दारू की बोतल और बायें में... एक बेल्ट |
शक्ल तो उसकी उसे अपने पिता से मिलती हुई लगी, पर वह.....नहीं!
रंग चुभ गए थे आज उसे....
काश! थोडा घुमाकर, वह यह आकृति भी बदल सकती!! ------------------------------------- -------------------------------------