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बस पौ फटने की देरी होती
और, वह दौडी आती,
आँगन की ओर....
मिची आँखें, नन्हें हाथों से मलते,
नंगे ही पाँव....
बीनने वो रंगीन कांच के टुकड़े
जो ना जाने कौन छोड़ जाता था
हर रात वहां
और बनता था कारण
उसके अचरज का ...
माँ को उसका यूँ टुकड़े बीनना
कभी भला ना लगा
"किसी दिन चुभ जायेंगे, तब समझोगी..."
वह फटकार लगा उसे
भगा देती...
पर माँ से नज़र बचाना
उसे खूब आता था
उसके उठने से पहले ही
एक एक छिटका रंग
बीन चुकी होती वो..
और फिर
उस छोटे से कमरे के
ऊंचे से छज्जे पर छि
प,
बनाया करती...
हर रोज़ एक नया kaleidoscope....
ज़िन्दगी में तो रंगों से उसका
कोई सरोकार हुआ ही नहीं
सो उनका आभाव भी नहीं खला !
पर हाँ,
यह कांच की रंगीन दुनिया
बहुत लुभा
ती थी उसे
ज़रा घुमाया नहीं,
की नजारे बदल गए... !!
"काश ज़िन्दगी भी
ऐसी ही होती!"
वह अक्सर सोचा करती
और साथ ही सोचती
"आज रात तो मैं
नहीं ही सोऊँगी,
और छिपकर देखूँगी
की आखिर वह कौन जादूगर है
जो रोज़ रोज़ यह रंगीन सौ
गातेछोड़ जाता है,
मेरे लिए..!!"
पर नींद उसकी सोच
कहाँ समझती थी!
वह तो आ ही जाती...
अपने समय पर |
पर आज,
आज नींद ने ना सही,
पर भगवान् ने उसकी सुन ली थी
और सोते सोते वह खुद ही चौं
क कर
उठ गयी |
बाहर आँगन से कुछ गिरने की
आवाज़ जो आई थी |
"ज़रूर वह जादूगर छत से गिर पडा होगा!"
सोचा उसने...
और दौड़ पड़ी....आँगन की ओर....
मिची आँखें, नन्हें हाथों से मलते,
नंगे ही पाँव....
सामने चांदनी बिखरी पड़ी थी
और कांच के बहुत से टुकड़े भी...
दूर एक कोने में माँ
भी पड़ी थी...
छिटकी..... सिमटी.... बिखरी सी..
बिलकुल कांच के टुकडों की ही तरह....
हरी .....नीली....बैंगनी सी......
और ठी
क सामने
खडा था ---- वह ,
लिए दाएं हाथ में
दारू की बोतल
और बायें में... एक बेल्ट |
शक्ल तो उसकी उसे
अपने पिता से मिलती हुई लगी,
पर वह.....नहीं!
रंग चुभ गए थे आज उसे....
काश! थोडा घुमाकर,
वह यह आकृति भी बदल सकती!!
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