Wednesday, May 04, 2016

खेल अब ये बिगाड़ना है मुझे

--------------------------------------------------------
उसने कुछ यूँ रिहा किया है मुझे
जैसे ख़ुद में पिरो रहा है मुझे
खेल अब ये बिगाड़ना है मुझे
‘अपने अंजाम का पता है मुझे’
लत न लग जाए ख़ाब की, बचना
मेरी नींदों का मशविरा है मुझे
उतरा सागर उदास लगता है
चाँद पानी में घोलना है मुझे
मैं ने ही तो बिछाई है ये बिसात
अपने अंजाम का पता है मुझे
यां की आबो-हवा भली है अभी
तितलयों ने बता दिया है मुझे
और गहरे हुए मिरे अक्षर
तुम ने जब भी मिटा दिया है मुझे
उसने यादें उधेड़ कर मेरी
अपने स्वेटर में बुन लिया है मुझे
कैक्टस जैसी याद हूँ और वो
रोज़ अश्कों से सींचता है मुझे
मुझ को हैरत है किस लिए ये घर
रोज़ हैरत से देखता है मुझे
मेरा हर वार जानता है वो
उसकी हर ढाल का पता है मुझे
--------------------------------------------------------

Thursday, November 12, 2015

~I am your museum~

--------------------------------------------------------
I don’t look like my mother; 
Not even the least.
Yet, I am she.
Her habits are mine,
so are her joys, her fears,
and to some extent, her beliefs too.
Yet, I do not resemble her.
I just bear her.
Like a museum,
where the remains on display
are not even vaguely
like the original organisms,
yet, remain preserved.
So is my mother.
Preserved in pieces, within me.
And so are you all my loves
who have touched my life
In an unforgettable way.
I bear you all.
I am your museum.

The Death Wish

--------------------------------------------------------
I wish I die.
Silently.
Like the leaf
that has just fallen down,
and no one noticed it.
Not even the tree
that bore it for so long.
Like the water drop
that decided to drown in itself
like a whirlpool
while the river was busy
chasing its existential purpose.
Or the ray of sunlight
that silently slit its wrist
and faded to white
when its twins
were rushing to
kill the darkness.
Or that distant star
that closed its eyes,
forever, after they got sore
watching over the world
for years.
Or may be that God,
who decided to
suffocate itself to death
with the offerings
you piled before him.
I wish to not leave behind
the deafening shrieks
and screams of loved ones
or a trail of silent mourners.
I wish to die quietly.
In seclusion,
In solitude.
In peace.
Like the universe.

Wednesday, July 15, 2015

My Life, Formatted!

--------------------------------------------------------
तुम्हारी याद की लंबी रात में,
सुब्ह का तारा कॉमा है;
भोर, पैराग्राफ ब्रेक
और दिन, दो पैराग्राफ के बीच में छूटी जगह |
--------------------------------------------------------

Monday, March 16, 2015

कस्टम-फिट का समय और बुद्ध

--------------------------------------------------------
वो बड़ी-बड़ी आँखों वाली लड़की थी
हाँ, बड़े सपनों वाली नहीं,
बड़ी आँखों वाली
उसे तलाश थी अपनी,
वो देखना चाहती थी खुद को,
उससे ज़ियादा,
जितना उसका आइना उसे दिखता था
सो, अपनी उम्र के अलग अलग पड़ाव पर
उसने चुने कई अलग अलग आईने
जिनमें कई जोड़ी आँखें शामिल थीं...
माँ, बाबा, भाई, बहन, दोस्त,
समाज, तीन प्रेमी
और-तो-और घुंगराले बालों वाले उस अजनबी की भी
जिससे उसका बस अजनबियत का रिश्ता था

पर हर बार उसने यही पाया कि
हर रिश्ते ने क़तर दिया था उसका अक्स
अपने आमाप के अनुसार
रिश्ते अपने समय से अछूते जो नहीं होते
और ये मेड-तो-मेज़र और कस्टम-फिट का समय था
खैर, अब वो थक गयी है है अपने आधे अधूरे अक्स देख के
सो, अब मूँद ली हैं उसने आखें,
सी लिए हैं होठ
और इक कवच क तौर पर
सजा ली है एक अधूरी मुस्कान
काश! वो अपने कान भी बंद कर पाती
जो अब आलोचनाओं, और विलापों के बोझ से
दिन-ब-दिन लम्बे हुए जाते हैं
सचमुच, बुद्ध होना आसन नहीं!
--------------------------------------------------------

Saturday, March 07, 2015

प्रिजर्वेशन या हत्या?

--------------------------------------------------------
मत लिखो कोई कविता
कि तुम्हारे उसे कागज़ पर दर्ज करते ही
एक जीती जागती कविता दम तोड़ देगी
क्यूंकि वह यह जानती है कि
अब उसे कोई जियेगा नहीं,
गुजर जायेंगे लोग
उसे अनदेखा करते हुए
यह सोच कर कि अब वह
प्रेज़र्व कर ली गयी है कागजों में,
बना ली गयी हैं उसकी कई कई प्रतियाँ,
और वे लौट सकते हैं उस तक
अपनी सहूलियत और मर्ज़ी से
और साथ ही वह यह भी जानती है
कि कोई नहीं लौटता उनतक
जिनके खोने का डर नहीं होता

--------------------------------------------------------

Friday, December 20, 2013

चाँद-गेंद

--------------------------------------------------------
गेंद है कोई 
चाँद किसी बच्चे की शायद
जिससे किसी पडोसी की खिड़की का कांच
टूट गया था छन से इक शब
और खडूस पडोसी नें वो गेंद उसे लौटाई नहीं
उस बच्चे से दूर बहुत ही
आसमान की ताक़ पे रख दी.. 
उसी ताक़ पे चाँद गेंद सा लुढका करता है..​
 --------------------------------------------------------

Sunday, April 14, 2013

ग़ज़ल में मेरी पहली कोशिश

--------------------------------------------------------
तुमको जब भी सोचा है
चुटकी में दिन बीता है

आ उलझा जो पेड़ों से
ठोकर खाया झोंका है

सहराओं में जाते ही
रस्ता रस्ता भूला है

जो तुझमें कोई ऐब नहीं,
फिर क्यूँ छिपता फिरता है?

दरिया में सूरज पिघला 
क्या वो बर्फ का गोला है?

दुनिया,दिल दोनों हों खुश
ख़ाब ये कितना महंगा है!

सूरज तेरे जलने से
शब का काजल बनता है

इतनी ठंढ औ इक बूढ़ा
कुहरा ओढ़े बैठा है

आँखें भी हैं नूर भी है
शह्र ये फिर भी अंधा है
--------------------------------------------------------
- वर्तिका

Wednesday, February 13, 2013

गुड-नून

--------------------------------------------------------
झुग्गियां, परछाइयां है महलों की
उखाड़ फेखने से ख़त्म नहीं होंगी ।
न ही ख़त्म होंगी वो
महलों को गिरा देने से,
क्यूंकि हर महल, खुद किसी
दूसरे बड़े महल की परछाई है ।

सो 'गर चाहते हो
कि न रहे झुग्गियां बाकी
तो उठाओ वो सूरज,
जो अभी किसी 'halo' सा चमकता है,
और रख दो उसे
संसार के सर के ठीक ऊपर 
 --------------------------------------------------------
* halo = तेजोमंडल, प्रकाश-चक्र

Thursday, May 19, 2011

"महा"-नगर

--------------------------------------------------------
सामने विस्तार ही विस्तार है

दूर तक फैला हुआ एक शहर है
जो समंदर किनारे बस गया
या समंदर आके उसके गले लग गया ...
पता नहीं!

पर समंदर है |
और उसका दूसरा छोर
उन पहाड़ों से जा मिला है...
पहाड़, जिनकी ऊँचाई इतनी है
कि बमुश्किल ही बताया जा सकता है
कि उन्होंने आसमान सर पर उठा रखा है
या कोई राज़ उगलवाने की खातिर
आसमाँ ने ही उन्हें सदियों से उल्टा लटका रखा है |

पर आसमान है |
और दूर तक है
इतनी दूर तक कि उसका दूसरा सिरा कहाँ है
मुझे नहीं दीखता...
शायद अनंत में होगा ...मुझे क्या ?

बारवीं मंजिल पर बैठ
शीशे कि दीवारों से
हर रोज़ देखती हूँ ये विस्तार
और हर रोज़ ही महसूसती हूँ
अपने भीतर कुछ घुटता हुआ ...

"महा"-नगर शायद
इसे ही कहते हैं !

 --------------------------------------------------------

Tuesday, April 12, 2011

जड़ें

--------------------------------------------------------
बहुत फैलीं हैं 
तेरी यादों कि  जड़ें


बरसात चाहे ज़हन के
जिस भी हिस्से में हो
पर जो ग़म हरा हुआ है 
तेरे नाम का ही रहा है 

--------------------------------------------------------

Tuesday, March 15, 2011

उदास दोपहरें



--------------------------------------------------------

छोटी थी,
तो अक्सर देखा करती थीमाँ को

उस उपर वाली दुछत्ती पे धरे
संदूक को उतार
उस की एक एक चीज़
फिर से खोल-तह, झाड पोंछ, सईहारते !
यह उसकी दैनिक नहीं
तो कम से कम
साप्ताहिक दिनचर्या का अंग तो था ही

यूँ तो उस संदूक में धरी
कोई भी चीज़
इंच भर भी
इधर से उधर नहीं हुई होती
और होती भी कहाँ से
दुछत्ती इतनी ऊंची थी
कि उस तक पहुँचने के लिए
माँ को भी
सबसे ऊंची वाली मेज के ऊपर
कुर्सी रख कर चढ़ना पड़ता...
...और फिर सबको पता था
कि उस संदूक में
नेपथलीन की गंध में तह किये
पुराने कपड़ों के सिवाय
और कुछ है भी नहीं.... |

पर फिर भी माँ उसे
अक्सर ही उतारती
और अपनी सारी दोपहर
उसके साथ ही बिता देती...

हाँ, माँ इस काम के किये खासतौर पर
दोपहरें ही चुना करती ...
...वो उदास दोपहरें |
अब यह कहना थोडा मुश्किल है
कि माँ उदास दोपहरें चुना करती थी...
या माँ को उदास देखकर
दोपहरें खुद ही उदास हो जाया करतीं...
पर हाँ, वो दोपहरें उदास होतीं ...

सच....उस वक़्त दूसरों की तरह
मुझे भी यही लगता था
कि माँ को काम करने की आदत है
और इसीलिए वो काम ना होने पर भी
काम ढूंढ लिया करती है
पर अब
जब खुद उस पड़ाव पर आ पहुंची हूँ
जहाँ ना तो नाखूनों पर चावल दे जाने वाले बगूलों ( माना जाता था कि इससे ख्वाहिशें पूरी होती हैं)
की अहमियत रह गयी है
ना ही जिद्द करने की उम्र
और जहाँ ख्वाहिशें अक्सर भविष्य के नाम लिखे
वर्तमान के किसी संदूक के हवाले कर दी जाती हैं,
बड़े एहतियात से... तब जा कर समझ आया है
कि उन् उदास दोपहरों की उदासी
आती कहाँ से थी....

--------------------------------------------------------

Tuesday, November 30, 2010

एक पुराना सवाल ... एक पुराना ख़याल...

--------------------------------------------------------

कैसे खड़ी हो जाती हैं
वहाँ दीवारें
मजहबों की
जहाँ दबी होती हैं
आहें, आंसू, सिसकियाँ  

कमज़ोर नहीं पड़ती
सीली ज़मीं पे रखी नीवें....?
 --------------------------------------------------------

Sunday, July 18, 2010

रिश्वतखोर खला की परतें ...

जानती हूँ
कुसूर तेरा नहीं खुदाया
जो दुआओं में मेरी
असर ना हुआ

ये खला की सात परतें
जो दरम्यान खड़ी है ना,
...रिश्वतखोर बहुत हैं !

खा जाती होंगी
तुझ तक पहुँचने से पहले ही 
थोड़े अलफ़ाज़, थोड़ी शिकायतें,
और ढेर सारी मिन्नतें
जो रोज़ भेजती हूँ तुझे
धूप, अर्घ्य और नवैध के साथ...

ठीक वैसे ही
जैसे कुतर जाती हैं किनारे
हर रोज़ आसमान में टंगे
उस गोल चाँद के
जब वह
सब सय्यारों को टापता हुआ
मेरी खिड़की से कूद
मेरी कोठरी के फर्श पर उतरता है....

बेचारा ! चौकोर ही बचा होता है तब....|

रिश्वतखोर बहुत हैं ये खला की सात परतें ...!

Friday, June 04, 2010

अधूरा सा कुछ ............पुराना सा कुछ .............उम्र सा कुछ.... अम्ल सा कुछ ......... खामोशी सा कुछ.......लफ्ज़ सा कुछ ........ मुझ सा कुछ .........और शायद .......तुम सा कुछ ............

--------------------------------------------------------
कहीं पढ़ा था
"लफ्जों के दांत नहीं होते,
पर काटते हैं,
और काट लें
तो फिर उनके ज़ख्म
उम्र भर नहीं भरते!"

पर तुम्हारी खामोशी...
वो तो काटती भी नहीं,
बस घुल जाती है,
रूह में,
और घुलते घुलते
घो़लती रहती है धीरे धीरे,
मुझे भी, अपने भीतर,
किसी अम्ल के मानिंद!
--------------------------------------------------------

Saturday, April 10, 2010

इल्ज़ाम

--------------------------------------------------------


मेरी कविताओं की दुनिया
तुम्हारे इर्द गिर्द फैली हुई थी….
हर शब्द, हर भाव
तुम्हारे ही चारो ओर घूमता था
तुम्हारे ही गुरुत्वाकर्षण से
उन्हें निश्चितता मिलती थी,
धुरी की ….


पर जबसे तुम छोड़ गए हो उन्हें
यह यहाँ बेतरतीब से बिखरे पड़े हैं........
गुरुत्व को लम्बी दूरियां तय करना
कब आया है !


यूँ तो तुम्हारी ही तरह
मैंने भी अपनी अलग दुनिया बसा ली है…
एक ऐसी दुनिया
जहां शब्दों की ज़रुरत ही नहीं.
संवाद एहसासों की शक्लों के ज़रिये होता है
नज्में जहाँ कलम से नहीं
ज़िन्दगी से फूटा करती हैं
पढ़ी सुनी लिखी नहीं,
जी जाती हैं
सच यह हसीं सी दुनिया
अपने आप में संपूर्ण है …
पर फिर भी मुझे
उन् शब्दों की बेतरतीबी खलती है
हाँ दुनिया नहीं, शब्द नहीं,
तुम भी नहीं,
बस उन् शब्दों की बेतरतीबी !
के अब जब वे नज्मों में
बहा नहीं करते,
तो बस टकराया करते हैं
एक दूसरे से,
लड़ा करते हैं
कभी आपस में, कभी खुद से ही ………….
चिल्लाया करते हैं,
बेवजह….
(शायद तुम्हें ही पुकारते हों,
बेवजह तो तब भी होगा)


नहीं जानती
यह शोर तुम्हारी दुनिया तक
पहुंचता है या नहीं
पर मेरी दुनिया तक आ ही जाता है
और मैं चाह कर भी
इसे अनसुना नहीं कर पाती
सिर्फ इसलिए ….इसीलिए ही लौटती हूँ
वापस उस बेतरतीब दुनिया में
दौड़ती हूँ हर एक शब्द के पीछे
जिनकी रफ़्तार
मेरे ख्यालों के रफ़्तार से भी तेज़ है
और आखिरकार
जब बहुत मेहनत के बाद
वह शब्द हाथ आ जाता है
तो तुरंत पिन कर देती हूँ उसे वहीं
तुम्हारी  ही किसी याद के सहारे |
उतना वेग और किसी तरह तो
संभाला जा नहीं सकता…………


यह सिलसिला जारी रहता है
मुसलसल कई दिनों तक
मेरी सांसें टूटने लगती हैं
और जब काफी सारे शब्द
तरतीब पा जाते हैं
तो लोग समझ बैठते हैं
मैंने तुम्हें याद कर
फिर एक नज़्म कह डाली….


उफ़... यह इल्ज़ाम कितना बड़ा है!
--------------------------------------------------------

Saturday, March 06, 2010

खामोशी:: यहाँ पसरी खामोशी को तोड़ने का एक प्रयास मात्र

--------------------------------------------------------

बरसों से ख़ामोशी खानाबदोश हुआ करती थी |

मेरी कठोर हंसी उसे घर बनाने ही कहाँ देती...!

जब भी उतरती फिज़ा में,

एक छनाके के साथ उतरती

और एक ही झटके में

चकनाचूर कर डालती,

चुप्पी की

आखिरी ईंट तक!


पर देखो,

अब कैसे इत्मीनान से पसरी बैठी है

यह हमारे दरमयां........

यकीं जो है इसे भी ,

के अब जो तुम चले गए हो

कभी ना लौटने की खातिर

तो रुख न करेगी इधर का

यह कमबख्त हंसी भी

दुबारा कभी


ख़ामोशी को है घर मिल गया

और मेरी हंसी

खानाबदोश सी फिरा करती हैं अब........!

--------------------------------------------------------

Sunday, December 13, 2009

मेरा घर

--------------------------------------------------------
बहुत दिन हुए
ठीक से सोयी नहीं |
कोई नज़्म जो नहीं लिखी तूने...

घर के सिवा सुकूं
कहाँ मिले है?
--------------------------------------------------------

तेरी यादें

--------------------------------------------------------
जब भी चाहा
तेरी यादों को दफन करना
तुझ संग बीता
हर लम्हा मुझे
साँस लेता हुआ मिला

अब तुम ही कहो
ज़िन्दगी का गला कैसे घोंटूं ?
--------------------------------------------------------

Wednesday, November 11, 2009

छल्ले

--------------------------------------------------------
रूह अब भी
अटकी हुई सी जान पड़ती है…
वहीं, उसी मोड़ पर, जहां
तुमने पहनाये थे
बाहों के छल्ले गले में
और घबराहट में मैंने
अपने दाहिने पाँव के अंगूठे को
आधे छल्ले सा मोड़
रख दिया था तेरे
बायें पाँव पर…।

नाखून चुभ गया था
तुझे मेरा ….
और दर्द से छटपटा
चिल्लाया था तू
“आह ”……॥

“ओह्ह !!!” कहकर खेद जताने को
होठों के छल्ले जोड़े ही थे मैंने,
की तूने झट अपने लब रख उनपर,
वो जगह भी भर दी थी….

गिरहें खोल मेरी, सुलझा रहा था
मुझको आहिस्ता आहिस्ता तू,
और साँसों के कुछ आवारा छल्ले
उलझ रहे थे आपस में …

वक़्त भी वहीँ कहीं उलझ गया होगा …
तभी तो देखो
वह मोड़ तो कबका गुज़र गया ….
तुमने अपना रस्ता भी बदल लिया,
और अब तो सुना है
अनामिका के छल्ले भी….
पर मेरी रूह....... वह तो अब भी वहीँ
अटकी हुई सी जान पड़ती है…

छुड़ा तो लूं, पर जाऊं कैसे..??
वह मोड़ तो एक स्वप्न में था …
और तुम बिन तो कोई स्वप्न भी मुझे
अपनी दहलीज तक लाँघने नहीं देता …..

सोचती हूँ तुम्हें आवाज़ दूं .....
यूँ टुकडों में अब और जिया नहीं जाता.....
पर फिर रहने देती हूँ.....
जानती हूँ, तुम अब नहीं लौटोगे..…
लौट भी नहीं सकते.....

पर सुनो... इतना तो कर ही सकते हो........

मुझे रिहाह करने की खातिर,
अपनी एक नज़्म ही भेज दो ना,
पिरोकर एक छल्ले के मानिंद………।

मैं उसे ही पहन गले में,
उसका एक सिरा
खींच लूंगी, अपने ही हाथों …।
साँसे ठहर जायेंगी,
और वक़्त,
फिर एक बार
चल पडेगा .....

मेरी रूह आज़ाद हो जायेगी…...........
हमेशा हमेशा के लिए !

सुनो,
इतना तो कर ही सकते हो ना.... ??